देश
‘शिक्षा की राजधानी’ में सिसकती उम्मीदें और बेरोजगारी का ‘नंबर वन’ दंश
प्रयागराज। कभी ‘शिक्षा का गढ़’ और ‘प्रतियोगी परीक्षाओं की राजधानी’ कहा जाने वाला प्रयागराज आज बेरोजगारी और हताशा का केंद्र बनता जा रहा है। संगम की इस धरती पर अपनी किस्मत चमकाने आए लाखों छात्र अब चुनावी वादों और लचर भर्ती प्रक्रियाओं के बीच खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। 21 से 27 साल की उम्र, जो करियर बनाने की होती है, यहाँ के छात्र उसे सिर्फ एक अदद वैकेंसी के इंतजार में गुजार रहे हैं।
तपते कमरे और खाली जेब, संघर्ष या सजा?

शहर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है, लेकिन सलोरी, बघाड़ा और अल्लापुर की तंग गलियों में स्थित छोटे-छोटे कमरों में छात्र बिना कूलर के रहने को मजबूर हैं। एक छात्र ने नम आंखों से बताया, गैस भरवाने के पैसे नहीं हैं, कूलर कहां से लगाएं? कूलर लगाएंगे तो मकान मालिक एक्स्ट्रा बिल मांगेगा। हालात इतने खराब हैं कि गैस की किल्लत और महंगाई के कारण कई छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ वापस घर लौटने की तैयारी कर रहे हैं।
भर्तियों की ‘पंचवर्षीय योजना’ और पेपर लीक का ग्रहण

छात्रों का सबसे बड़ा आक्रोश भर्ती प्रक्रियाओं में हो रही देरी और पेपर लीक की घटनाओं को लेकर है। शिक्षक भर्ती का बुरा हाल छात्रों के अनुसार, 2018 के बाद से प्राथमिक शिक्षक भर्ती का कोई अता-पता नहीं है। टीजीटी-पीजीटी की परीक्षाएं सालों से लटकी हुई हैं।
पेपर लीक की मार: यूपी पुलिस और अन्य परीक्षाओं में बार-बार होते पेपर लीक ने युवाओं के आत्मविश्वास को तोड़ दिया है। छात्रों का कहना है कि 6 साल में एक वैकेंसी आती है और वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है।
एक छात्र ने बताया, जितने पैसे हमने फॉर्म भरने और कोचिंग की फीस में लुटा दिए, उतने में तो हमारा कोई अच्छा स्टार्टअप चल गया होता।
शिक्षा अब मौलिक अधिकार नहीं, ‘महंगा व्यापार’
प्रयागराज में शिक्षा का बाजारीकरण भी छात्रों की कमर तोड़ रहा है। कोचिंग संस्थानों की फीस 20,000 से 30,000 रुपये तक पहुँच गई है, जबकि कमरों का किराया हर साल बढ़ रहा है। किसान परिवारों से आने वाले युवाओं के लिए 3000-4000 रुपये का मासिक खर्च उठाना पहाड़ जैसा हो गया है। सरकारी दावों के विपरीत, धरातल पर छात्र खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
स्टार्टअप और सरकारी दावों पर सवाल
सरकार भले ही ‘मुद्रा लोन’ और ‘पकौड़ा रोजगार’ जैसे विकल्पों की बात करे, लेकिन यहाँ का युवा इसे ‘छलावा’ मानता है। छात्रों का तर्क है कि 1-2 लाख के लोन से कोई सम्मानजनक स्टार्टअप शुरू नहीं किया जा सकता। प्राइवेट सेक्टर में जॉब सिक्योरिटी की कमी और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा की जा रही छंटनी ने युवाओं को सरकारी नौकरी के प्रति और अधिक आश्रित बना दिया है।
क्या चुनावों में गूंजेगी छात्रों की आवाज?
2024 के घटनाक्रमों और पेपर लीक की दास्तानों ने प्रयागराज के छात्रों को संगठित कर दिया है। छात्रों का कहना है कि वे केवल वोट बैंक नहीं हैं। यदि सरकार उनकी मूलभूत समस्याओं जैसे नियमित वैकेंसी, निष्पक्ष परीक्षा और रहने-खाने की सस्ती सुविधा पर ध्यान नहीं देती, तो आने वाले समय में यह आक्रोश सत्ता के समीकरण बदल सकता है।
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