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सूरत में सिटी बस सेवा का हाल बेहाल: 250 में 212 से ज्यादा बसें खड़ी, करोड़ों के टेंडर पर उठे सवाल
सूरत। शहर में गरीब, मजदूर, छात्र और मध्यमवर्गीय यात्रियों को सस्ती और बेहतर सार्वजनिक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई सिटी बस सेवा अब गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि बड़ी संख्या में बसें लंबे समय से डिपो में खड़ी हैं, जबकि महानगरपालिका के रिकॉर्ड में बसों के संचालन और यात्रियों को सुविधा देने के दावे किए जा रहे हैं। जमीनी स्थिति और कागजी आंकड़ों के बीच कथित अंतर ने पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
250 बसों में 212 से ज्यादा के बंद होने का दावा
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान दावा किया गया कि करीब 250 बसों में से 212 से अधिक बसें फिलहाल संचालन से बाहर हैं। कई बसें डिपो में खड़ी हैं और उनकी हालत बेहद खराब बताई जा रही है। कुछ बसें ऐसी भी दिखाई गईं, जिनके लंबे समय से इस्तेमाल में नहीं होने के संकेत मिलते हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि बड़ी संख्या में बसें केवल कागजों पर संचालित दिखाई जा रही हैं, जबकि वास्तविकता में यात्रियों को पर्याप्त बसें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
डिपो में खड़ी बसों के बीच यात्रियों की बढ़ती भीड़
बसों की कमी का सीधा असर यात्रियों पर पड़ने का आरोप है। छात्रों, मजदूरों और मध्यमवर्गीय यात्रियों को सीमित संख्या में चल रही बसों में भारी भीड़ के बीच सफर करना पड़ रहा है। यात्रियों की भीड़ और बसों में धक्का-मुक्की से जुड़े वीडियो समय-समय पर सामने आने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। सवाल यह है कि जब बड़ी संख्या में बसें उपलब्ध होने का दावा किया जा रहा है, तो सड़क पर यात्रियों को पर्याप्त बसें क्यों नहीं मिल रही हैं?
मेंटेनेंस के नाम पर बसें डिपो में, लेकिन सड़क पर वापसी कब?
महानगरपालिका और संबंधित एजेंसियों की ओर से बसों के मेंटेनेंस की बात कही जाती है। लेकिन ग्राउंड पर सवाल यह है कि अगर इतनी बड़ी संख्या में बसें लगातार मेंटेनेंस में हैं, तो वे दोबारा सड़क पर कब उतरेंगी? डिपो में खड़ी बसों की हालत देखकर उनके रखरखाव की व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। करोड़ों रुपये के टेंडर और मेंटेनेंस के दावों के बावजूद यदि बसें संचालन योग्य नहीं हैं, तो खर्च किए जा रहे सार्वजनिक धन की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कॉन्ट्रैक्ट देने वाली एजेंसियों पर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में हंसा ट्रेवल्स को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दावा किया गया कि एजेंसी को पहले भी बस संचालन का ठेका दिया गया था और उस दौरान भी बड़ी संख्या में बसें डिपो में खड़ी रहने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद एजेंसी को दोबारा कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। दावे के अनुसार, वर्तमान में भी बड़ी संख्या में बसें अलग-अलग डिपो में खड़ी हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित एजेंसी का पक्ष सामने आना बाकी है।
अन्य एजेंसियों की बसों पर भी सवाल
रिपोर्ट में ओलेक्ट्रा और ग्रीनसेल जैसी अन्य एजेंसियों के संचालन पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा है कि निर्धारित संख्या में बसों का कॉन्ट्रैक्ट होने के बावजूद बड़ी संख्या में बसें चार्जिंग या मेंटेनेंस के नाम पर डिपो में खड़ी रहती हैं। यदि कुल स्वीकृत बसों और वास्तव में सड़क पर चल रही बसों की संख्या में इतना बड़ा अंतर है, तो सवाल यह है कि महानगरपालिका यात्रियों को उपलब्ध कराई जा रही वास्तविक परिवहन क्षमता का हिसाब किस आधार पर कर रही है?
फिटनेस सर्टिफिकेट पर भी सवाल
रिपोर्ट में बसों की फिटनेस को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया कि कई बसों की हालत ऐसी है कि उनके फिटनेस प्रमाणपत्र को लेकर संदेह पैदा होता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बसें वास्तव में संचालन के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें फिटनेस प्रमाणपत्र किस आधार पर मिला? क्या सभी बसों की फिटनेस जांच नियमानुसार हुई? इन सवालों का जवाब संबंधित परिवहन विभाग और महानगरपालिका से अपेक्षित है।
ड्राइवरों की संख्या को लेकर भी बड़ा सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 250 बसों के संचालन के लिए दो ड्राइवरों और अलग-अलग शिफ्ट की व्यवस्था को देखते हुए बड़ी संख्या में ड्राइवरों की आवश्यकता होनी चाहिए। लेकिन संबंधित डिपो में ड्राइवरों की संख्या काफी कम होने का दावा किया गया है। यदि वास्तव में निर्धारित संख्या से काफी कम ड्राइवर उपलब्ध हैं, तो यह सवाल उठता है कि बसों का संचालन किस व्यवस्था के तहत हो रहा है। क्या ड्राइवरों से अतिरिक्त शिफ्ट में काम कराया जा रहा है? यदि ऐसा है तो उनकी कार्यस्थितियों और यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
किलोमीटर के हिसाब से भुगतान, लेकिन मीटर पर सवाल
बस संचालन में भुगतान बस द्वारा तय किए गए किलोमीटर के आधार पर होने का दावा किया गया है। ऐसे में प्रत्येक बस की वास्तविक किलोमीटर रीडिंग का रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कई बसों में मीटर या किलोमीटर रिकॉर्डिंग व्यवस्था को लेकर सवाल हैं। यदि किलोमीटर के आधार पर भुगतान किया जा रहा है, तो महानगरपालिका के पास प्रत्येक बस की यात्रा, रूट और किलोमीटर का प्रमाणित डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए। यही रिकॉर्ड यह स्पष्ट कर सकता है कि कौन-सी बस वास्तव में कितने किलोमीटर चली और उसके आधार पर कितना भुगतान किया गया।
₹1,500 करोड़ के आंकड़े का दावा, जवाबदेही पर सवाल
रिपोर्ट में सार्वजनिक धन के करीब ₹1,500 करोड़ से जुड़े नुकसान या टेंडर का दावा किया गया है। हालांकि इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि संबंधित दस्तावेजों से होना आवश्यक है। यदि इतनी बड़ी राशि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर खर्च की जा रही है, तो नागरिकों का यह जानना जरूरी है कि पैसा किस एजेंसी को, किस शर्त पर और किस काम के लिए दिया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि भुगतान वास्तविक संचालन के आधार पर हुआ या केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर।
2024 से मुद्दा उठाने का दावा
रिपोर्ट में संबंधित शिकायतकर्ता/आवाज उठाने वाले व्यक्ति की ओर से दावा किया गया कि इस पूरे मामले को वर्ष 2024 में भी उठाया गया था और उस समय समाचार पत्रों में इससे संबंधित खबरें प्रकाशित हुई थीं। यदि पहले भी शिकायतें और दस्तावेज सामने आए थे, तो सवाल यह है कि अब तक प्रशासनिक स्तर पर क्या कार्रवाई हुई? क्या किसी अधिकारी, एजेंसी या ठेकेदार की जिम्मेदारी तय की गई? यदि जांच हुई तो उसका परिणाम क्या रहा?
कमीशन के आरोपों की भी जांच की मांग
रिपोर्ट में ठेकों और भुगतान से जुड़े कथित 2 प्रतिशत कमीशन के आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि यह एक गंभीर आरोप है और इसकी पुष्टि स्वतंत्र दस्तावेजी जांच के बिना नहीं की जा सकती। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि कमीशन या किसी प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित पक्षों को तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
‘स्मार्ट सिटी’ के दावों के बीच सार्वजनिक परिवहन की बदहाल तस्वीर
सूरत को स्मार्ट सिटी और तेजी से विकसित हो रहे शहर के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। एक तरफ सस्ती बस सेवा, छात्रों के लिए पास और बेहतर परिवहन सुविधा के दावे हैं, तो दूसरी तरफ यात्रियों को सीमित बसों में भीड़ के बीच सफर करने की मजबूरी का आरोप है। डिपो में खड़ी बसें और सड़क पर यात्रियों की भीड़ इस विरोधाभास को सामने लाती है।
जनता के टैक्स के पैसे का हिसाब कौन देगा?
पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि बसों की संख्या कागजों में अधिक और सड़क पर कम है, तो सार्वजनिक धन का भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है? महानगरपालिका को प्रत्येक बस की वास्तविक स्थिति, फिटनेस, रूट, किलोमीटर, ड्राइवरों की संख्या, मेंटेनेंस रिकॉर्ड और ठेकेदारों को किए गए भुगतान का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।
सिटी बस सेवा जनता के पैसे से चलने वाली व्यवस्था है। इसलिए जनता को केवल कागजों पर बसों की संख्या नहीं, बल्कि सड़क पर चलती बसों की वास्तविक सुविधा चाहिए। अब सवाल यह है कि डिपो में खड़ी इन बसों की जिम्मेदारी कौन लेगा और यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधा आखिर कब मिलेगी?
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