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मिर्जापुर की सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे, 10 मिनट का सफर 30 मिनट में, जिम्मेदारी तय करने की मांग
मिर्जापुर। वेब सीरीज मिर्जापुर की पहचान भले ही ‘भौकाल’ से जुड़ी हो, लेकिन जमीनी हकीकत में शहर की सड़कों की हालत लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। शहर के कई हिस्सों में सड़कें जगह-जगह खुदी पड़ी हैं, गड्ढों और उबड़-खाबड़ रास्तों के कारण वाहनों की रफ्तार धीमी हो गई है और यात्रियों को छोटे सफर में भी लंबा समय लग रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर काम तो होता है, लेकिन गुणवत्ता और निगरानी के अभाव में सड़कें जल्द ही दोबारा खराब हो जाती हैं।
10 मिनट का सफर, आधे घंटे में तय करने की मजबूरी
स्थानीय लोगों के मुताबिक मिर्जापुर शहर में कई ऐसे रास्ते हैं, जहां सामान्य परिस्थितियों में 10 मिनट में तय होने वाली दूरी पूरी करने में 25 से 30 मिनट तक लग जाते हैं। सड़क पर जगह-जगह बने गड्ढे, ऊंच-नीच और निर्माण कार्य के कारण वाहन चालकों को बार-बार गति कम करनी पड़ती है। टोटो, ऑटो और दोपहिया वाहन चालकों के लिए समस्या और गंभीर हो जाती है। लोगों का कहना है कि लगातार उबड़-खाबड़ सड़क पर चलने से वाहन खराब होने का खतरा रहता है, जबकि गड्ढों के कारण दुर्घटनाओं की आशंका भी बनी रहती है।
जसोवर से स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क पर बदहाली
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान जसोवर की ओर जाने वाले मार्ग और स्टेशन की तरफ जाने वाली सड़क के एक हिस्से की स्थिति सामने आई। करीब 100 से 150 मीटर का हिस्सा जगह-जगह खुदा हुआ दिखाई दिया। सड़क के आगे भी बदहाली की स्थिति होने की बात स्थानीय लोगों ने कही। स्थानीय निवासियों के अनुसार यह स्थिति कुछ दिनों की नहीं है। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि सड़क करीब 7 से 8 महीने से इसी तरह खराब पड़ी है।
गिट्टी डाली, रोलर चला और फिर सड़क उखड़ गई
स्थानीय लोगों ने सड़क निर्माण के तरीके पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि पहले सड़क की खुदाई की जाती है, उसके बाद बालू और गिट्टी डाली जाती है तथा रोलर चलाकर काम पूरा कर दिया जाता है। लेकिन कुछ ही समय बाद सड़क फिर उखड़ने लगती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार हाल ही में सड़क पर गिट्टी डाली गई थी। इसके बाद दोबारा सामग्री डालकर सड़क को दुरुस्त करने का प्रयास किया गया, लेकिन बारिश और वाहनों की आवाजाही के बाद सड़क फिर खराब हो गई। सवाल यह है कि यदि सड़क की मरम्मत बार-बार करनी पड़ रही है, तो निर्माण की गुणवत्ता और ठेकेदारों की जवाबदेही की जांच कौन करेगा?
बारिश से पहले ही जलभराव की स्थिति
सड़क के किनारे जलभराव की स्थिति भी देखने को मिली। स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के बाद समस्या और बढ़ जाती है। सड़क की सतह कमजोर होने के कारण पानी जमा होने से गड्ढे और गहरे हो जाते हैं। कुछ हिस्सों में सड़क इतनी कमजोर दिखाई दी कि भारी वाहनों के गुजरने पर उसके धंसने की आशंका बनी हुई थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार वाहन सड़क के कमजोर हिस्सों में फंस जाते हैं।
टू-वे सड़क बनी वन-वे
स्थानीय लोगों के अनुसार जिस सड़क पर पहले दोनों दिशाओं से वाहनों का आवागमन होता था, अब गड्ढों और खराब सतह के कारण उसका एक हिस्सा लगभग उपयोग से बाहर हो गया है। वाहन चालक खराब हिस्से से बचने के लिए सड़क के एक ही हिस्से से निकलने की कोशिश करते हैं। इससे जाम और दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
भारी वाहनों की आवाजाही वाले मार्ग पर यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। सवाल उठता है कि यदि सड़क पर लगातार भारी वाहन चलते हैं तो निर्माण के दौरान उसकी क्षमता और गुणवत्ता का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?
हर 10-20 मीटर पर गड्ढे होने का आरोप
ग्राउंड रिपोर्ट में स्थानीय लोगों ने दावा किया कि शहर की कई सड़कों पर लगभग हर 10 से 20 मीटर के अंतराल पर गड्ढे दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि शहर के अंदर ऐसी बहुत कम सड़कें हैं, जहां बिना झटकों और ब्रेक लगाए लगातार वाहन चलाया जा सके।
दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से जोखिमपूर्ण बताई जा रही है। वहीं टोटो और ऑटो चालकों को भी लगातार स्पीड कम करनी पड़ती है।
गोपीगंज मार्ग पर भी सड़क की स्थिति खराब होने का दावा
स्थानीय लोगों ने गोपीगंज की ओर जाने वाले मार्ग की स्थिति को लेकर भी शिकायत की। उनका कहना है कि वहां भी कई जगह सड़क खुदी हुई है और निर्माण के बाद उसे लंबे समय तक अधूरा छोड़ दिया जाता है। लोगों का आरोप है कि सड़क खोदने के बाद समय पर काम पूरा नहीं होने से आम लोगों को लगातार परेशानी झेलनी पड़ती है।
‘सड़क बनती है या सिर्फ खानापूर्ति होती है?’
स्थानीय लोगों की शिकायत का सबसे बड़ा सवाल सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर है। यदि किसी सड़क की मरम्मत के कुछ दिनों बाद ही गिट्टी उखड़ने लगे, सड़क धंसने लगे और पानी जमा होने लगे, तो निर्माण सामग्री और गुणवत्ता की जांच जरूरी हो जाती है।
जनता के टैक्स से बनने वाली सड़कों पर खर्च होने वाले पैसे का हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। किस एजेंसी या ठेकेदार को काम दिया गया, कितनी राशि स्वीकृत हुई, किस गुणवत्ता मानक के तहत काम हुआ और निर्माण के बाद कितने समय तक सड़क की जिम्मेदारी ठेकेदार की है—इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
सिर्फ मिर्जापुर शहर नहीं, ग्रामीण इलाकों में भी परेशानी
रिपोर्ट के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों का भी उल्लेख किया गया। वहां भी कई स्थानों पर सड़कें खराब होने और आवागमन में परेशानी की शिकायत सामने आई। इससे सवाल उठता है कि समस्या केवल किसी एक सड़क या एक इलाके तक सीमित है या जिले की सड़क व्यवस्था में व्यापक स्तर पर सुधार की जरूरत है।
‘भौकाल नहीं, सड़क चाहिए’
मिर्जापुर को लेकर स्थानीय लोगों में यह नाराजगी दिखाई देती है कि राजनीतिक स्तर पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की स्थिति जस की तस बनी रहती है। जनता का कहना है कि उन्हें बड़े वादों या घोषणाओं से ज्यादा जरूरत ऐसी सड़कों की है, जिन पर वे सुरक्षित तरीके से अपने घर, स्कूल, कॉलेज, बाजार और काम की जगह तक पहुंच सकें।
‘उड़ने वाली बसों’ से पहले जमीन की सड़कें ठीक करने की मांग
सड़क परिवहन से जुड़े भविष्य के बड़े प्रोजेक्ट और आधुनिक परिवहन की योजनाओं के बीच ग्राउंड रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि नई तकनीक की योजनाओं से पहले मौजूदा सड़कों की स्थिति सुधारना जरूरी है। लोगों का तर्क है कि यदि सामान्य सड़क परिवहन ही सुरक्षित और सुचारु नहीं है, तो भविष्य की अत्याधुनिक परिवहन योजनाओं का लाभ आम जनता तक कैसे पहुंचेगा?
केंद्र और राज्य सरकार से मांग है कि बड़े प्रोजेक्ट के साथ-साथ शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की मौजूदा सड़कों की गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए।
एक्सप्रेसवे से लेकर शहर की गलियों तक गुणवत्ता की निगरानी जरूरी
सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवाल केवल मिर्जापुर तक सीमित नहीं हैं। कई जगह सड़क बनने के बाद जल्दी खराब होने, मरम्मत के कुछ समय बाद दोबारा गड्ढे बनने और निर्माण के लिए सड़क खोदकर लंबे समय तक अधूरा छोड़ने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। ऐसे में सड़क निर्माण के हर चरण की स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, नियमित निरीक्षण और खराब सड़क के लिए जिम्मेदार एजेंसी पर जवाबदेही तय करने की व्यवस्था जरूरी है।
जवाबदेही तय नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सड़क की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो जनता को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ सकता है। लोगों की मांग है कि संबंधित विभाग सड़क की स्थिति का निरीक्षण करे, अधूरे काम पूरे कराए और खराब निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करे।
आखिर जिम्मेदार कौन?
मिर्जापुर की सड़कों की तस्वीर कई सवाल छोड़ती है—सड़क महीनों तक खुदी क्यों रहती है? मरम्मत के कुछ दिनों बाद गिट्टी क्यों उखड़ जाती है? जल निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं सुधरती? निर्माण की गुणवत्ता की जांच कौन करता है? और सड़क खराब होने पर जवाबदेही किसकी तय होती है? जनता को अब सिर्फ सड़क बनाने का दावा नहीं, बल्कि ऐसी सड़क चाहिए जो बारिश, भारी वाहनों और रोजमर्रा के यातायात का दबाव झेल सके। मिर्जापुर की बदहाल सड़कों का समाधान घोषणाओं से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण निर्माण, नियमित निगरानी और तय जवाबदेही से ही संभव होगा।

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