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फूल नहीं, चिंगारी हैं हम भारत की नारी, मानदेय और स्थायीकरण की मांग को लेकर आशा सहयोगिनियों का प्रदर्शन
चित्तौड़गढ़। फूल नहीं, चिंगारी हैं, हम भारत की नारी हैं, इन नारों के साथ चित्तौड़गढ़ जिला कलेक्ट्रेट परिसर में बड़ी संख्या में आशा सहयोगिनियों ने प्रदर्शन किया। जिले के अलग-अलग ब्लॉकों से पहुंची आशा कार्यकर्ताओं ने मानदेय में बढ़ोतरी, समय पर भुगतान, स्थायीकरण और सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्हें कई महीनों से मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है, जबकि काम का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है।
5 हजार से भी कम मानदेय, घर चलाना मुश्किल
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने कहा कि उनका मौजूदा मानदेय करीब ₹5 हजार या उससे भी कम है। कई कार्यकर्ताओं का दावा है कि चार से छह महीने तक भुगतान नहीं होने के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। एक आशा कार्यकर्ता ने कहा, “हम दिन-रात काम करते हैं, लेकिन समय पर पैसा नहीं मिलता। सरकार के किसी कर्मचारी को अगर पांच-छह महीने वेतन न मिले तो उसके घर की स्थिति क्या होगी, यह सरकार को समझना चाहिए।कार्यकर्ताओं ने सरकार से मानदेय बढ़ाकर ₹26 हजार प्रतिमाह करने की मांग की।
मूल काम छोड़कर दूसरे विभागों का काम कराया जा रहा
आशा सहयोगिनियों ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अपने मूल कार्यों के अलावा उन पर लगातार अतिरिक्त जिम्मेदारियां डाली जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, आधार आईडी, आयुष्मान कार्ड, पंचायत संबंधी कार्य, ऑनलाइन डाटा और विभिन्न मोबाइल ऐप पर काम करने जैसी जिम्मेदारियां भी उनसे कराई जा रही हैं। एक कार्यकर्ता ने कहा कि लगातार बढ़ते ऑनलाइन काम और ऐप के कारण उनका अधिकांश समय डाटा भरने में चला जाता है। इससे गर्भवती महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े उनके मूल कार्य प्रभावित होते हैं।
मातृ और शिशु मृत्यु दर कम करने में हमारी भूमिका
आशा कार्यकर्ताओं ने कहा कि उनका मुख्य काम गर्भवती महिलाओं का पंजीयन, स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण और प्रसव के दौरान सहयोग सहित कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा है। उनका दावा है कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में आशा कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी गर्भवती महिला या बच्चे की मृत्यु होती है तो कई बार उसका जिम्मा आशाओं पर डाल दिया जाता है, लेकिन ड्यूटी के दौरान दुर्घटना या अन्य परेशानी होने पर उनकी सुरक्षा और परिवार की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होता।
20 साल काम किया, फिर भी स्थायी नहीं
प्रदर्शन में शामिल कुछ आशा कार्यकर्ताओं ने बताया कि वे करीब 15 से 20 वर्षों से सेवाएं दे रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला। उनका कहना था कि इतने लंबे समय तक काम करने के बावजूद मानदेय बेहद कम है और नौकरी की सुरक्षा भी नहीं है। कार्यकर्ताओं ने मांग की कि उन्हें संविदा कर्मचारी घोषित करने के साथ स्थायी किया जाए, उचित वेतन दिया जाए और सेवानिवृत्ति की उम्र तथा सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा पर भी सरकार निर्णय ले।
ड्यूटी के दौरान दुर्घटनाओं पर भी उठाए सवाल
आशा कार्यकर्ताओं ने ड्यूटी के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं और उनके परिवारों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गांव-गांव और घर-घर जाने के दौरान यदि कोई दुर्घटना होती है तो कई बार परिवार को ही उसका आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। उन्होंने सरकार से ड्यूटी के दौरान दुर्घटना की स्थिति में उचित सहायता और मुआवजे की व्यवस्था करने की मांग की।
मांगें नहीं मानीं तो आंदोलन और चुनाव में विरोध
प्रदर्शन में कई महिलाओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। कुछ प्रदर्शनकारियों ने धरना जारी रखने और गिरफ्तारी देने तक की बात कही। वहीं, कुछ आशा कार्यकर्ताओं ने आगामी चुनावों में सरकार का विरोध करने और वोट बहिष्कार की चेतावनी भी दी। उनका कहना था कि हजारों आशा कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की मांगों की अनदेखी की गई तो इसका राजनीतिक असर चुनाव में देखने को मिल सकता है।
काम के बदले समय पर दाम चाहिए
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे काम करने से पीछे नहीं हट रही हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि जितनी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, उसके अनुरूप मानदेय दिया जाए और भुगतान समय पर हो। उनका कहना था कि काम हम करेंगे, लेकिन काम के बदले उचित दाम और सम्मान भी मिलना चाहिए। अब देखना होगा कि आशा सहयोगिनियों की इन मांगों पर राजस्थान सरकार क्या कदम उठाती है और महीनों से लंबित भुगतान तथा मानदेय बढ़ाने के मुद्दे पर सरकार की ओर से क्या निर्णय लिया जाता है।
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