देश
विकास के ‘पीले पंजे’ ने छीना आशियाना: 45 डिग्री की चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे आए एकता कैंप के सैकड़ों मासूम
नई दिल्ली। तिनका-तिनका चुनकर हम गरीबों ने अपना घोंसला बनाया था। जब घोंसला बन गया, तो सरकार ने इसे बेरहमी से उजाड़ दिया। अगर हमें रहने ही नहीं देना था, तो पहले बसने क्यों दिया? यह दर्द समस्तीपुर से आकर दिल्ली के शालीमार बाग स्थित ‘एकता कैंप’ में पिछले 15 वर्षों से रह रही पार्वती देवी का है।
दिल्ली में इस समय आसमान से आग बरस रही है। पारा 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। इस भीषण और जानलेवा गर्मी में, जहां लोग घरों से निकलने से कतरा रहे हैं, शालीमार बाग के एकता कैंप में पिछले चार-पांच दिनों से लगातार एमसीडी और प्रशासन का बुलडोज़र चल रहा है। विकास और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर सैकड़ों परिवारों के आशियाने को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया है।
बिना मोहलत मलबे में दबा ‘पाई-पाई का सामान’
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें अपना सामान हटाने तक की मोहलत नहीं दी। पीड़ितों ने हाथ-पैर जोड़े, वक्त मांगा, लेकिन बुलडोज़र थमा नहीं। मेहनत की कमाई से खरीदे गए बेड, टीवी, एलसीडी और घरेलू सामान आज मलबे के नीचे दबे हुए हैं। चार बेटियों और एक बेटे की मां ने रोते हुए बताया, हमसे सामान निकालने का वक्त तक छीन लिया गया। अब नए आशियाने के लिए मकान ढूंढ रहे हैं, तो लोग 11,000 रुपये एडवांस मांग रहे हैं। एक अकेला कमाने वाला मजदूर इस चिलचिलाती धूप में बच्चों को पाले या एडवांस का इंतजाम करे?
सड़क निर्माण से दूर अंदर की झुग्गियों पर भी चली जेसीबी
ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, यदि सड़क निर्माण के दायरे में आने वाली झुग्गियों को हटाया जाता तो बात समझ आती। लेकिन सड़क की सीमा से लगभग 20-30 मीटर अंदर बसी झुग्गियों को भी जमींदोज़ कर दिया गया। स्थानीय लोगों ने पक्षपात का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, सामने कुछ झुग्गियों को छोड़ दिया गया है क्योंकि वहां कथित तौर पर रसूखदार या सरकारी तंत्र से जुड़े लोग रहते हैं, और हम गरीबों पर पूरा जोर आजमाया गया है।

मलबे के नीचे दबते-दबते बची मासूम की जान
डिमोलिशन के दौरान एक बेहद दर्दनाक वाकया सामने आया। जब
जेसीबी ने एक झुग्गी पर अचानक प्रहार किया, तो वहां सीढ़ियों पर खेल रहा एक मासूम बच्चा मलबे में दब गया। स्थानीय लोगों ने मुस्तैदी दिखाकर उसे बाहर निकाला और बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंचाया। पीड़ितों का आरोप है कि मौके पर मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों का रवैया बेहद असंवेदनशील था।
‘हम बांग्लादेशी नहीं, समस्तीपुर के बिहारी हैं’
अक्सर झुग्गियों पर कार्रवाई के दौरान उन्हें ‘रोहिंग्या’ या ‘बांग्लादेशी’ कहकर जनभावनाओं को भड़काने की कोशिश की जाती है। लेकिन एकता कैंप के लोगों ने दो टूक शब्दों में अपनी पहचान बताई। पीड़ितों ने कहा, हम कोई घुसपैठिये नहीं हैं। हम बिहार के समस्तीपुर जिले के रहने वाले भारतवासी हैं। हम अपनी मेहनत की रोटी कमाते हैं।
चुनावी वादे बनाम जमीनी हकीकत
यह इलाका स्थानीय विधायक और जनप्रतिनिधियों का विधानसभा क्षेत्र है। चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा ‘जहां झुग्गी, वहीं मकान’ का नारा बड़े जोर-शोर से दिया गया था। लेकिन आज जब इन वोटरों को अपनी चुनी हुई सरकार और नेताओं की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब जमीन पर सांत्वना देने वाला भी कोई मुखिया या लीडर नजर नहीं आया।
इस तपती धूप में कहां जाएं ये बच्चे?
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कॉपी और पेन होना चाहिए, उस उम्र में एकता कैंप के 3-4 साल के मासूम बच्चे मलबे से ईंट और प्लास्टिक के टुकड़े चुनकर फिर से सिर छुपाने की जगह तलाश रहे हैं।
प्रशासनिक स्तर पर विकास की रफ्तार जरूरी हो सकती है, लेकिन इस जानलेवा मानवीय संकट और चिलचिलाती धूप के बीच बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के लोगों को बेघर कर देना ‘विकसित भारत’ की अवधारणा पर एक बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। फिलहाल, एकता कैंप के ये बेघर लोग भूखे-प्यासे सड़कों पर रात गुजारने को मजबूर हैं।
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