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भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़ा ‘आसरा’: गाजियाबाद के लोनी में भरभरा कर टूट रहे प्रधानमंत्री आवास, मंडरा रहा बड़ा हादसा

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गाजियाबाद। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला हो सकता है, इसका जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण गाजियाबाद के लोनी इलाके में देखने को मिल रहा है। ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत गरीबों को छत देने के नाम पर जो फ्लैट सौंपे गए थे, वे आज भ्रष्टाचार की जीती-जागती मिसाल बन चुके हैं। निर्माण के महज 11 साल और आवंटन के मात्र 9 साल के भीतर ही यह पूरी कॉलोनी डेंजर जोन में तब्दील हो चुकी है। यहाँ के निवासी हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर जीने को मजबूर हैं, और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अधिकारी पूरी तरह आंखें मूंदे बैठे हैं।

भ्रष्टाचार की ईंटों से बनी इमारत, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

लोनी स्थित इस आसरा कॉलोनी की जमीनी हकीकत बेहद डरावनी है। इमारतों का प्लास्टर इस कदर सड़ चुका है कि हाथ लगाते ही वह रेत की तरह ढह जाता है। फ्लैट्स के भीतर की स्थिति और भी बदतर है। किचन के फर्श टूटकर नीचे धंस चुके हैं, और छतों से कंक्रीट का मलबा लगातार गिर रहा है। हालत यह है कि छतों का प्लास्टर गिरने के बाद अब अंदर लगी लोहे की सरियाँ साफ दिखाई दे रही हैं, जिनमें जंग लग चुका है। आर्किटेक्ट्स के मुताबिक, जब सरियों में जंग लग जाता है तो इमारत की उम्र और मजबूती पूरी तरह खत्म हो जाती है।
हाल ही में यहाँ एक बड़ा हादसा होते-होते टला, जब ऊपर की बालकनी का एक बड़ा हिस्सा भरभरा कर नीचे आ गिरा। उस वक्त वहाँ छोटे बच्चे खेल रहे थे, जो बाल-बाल बच गए। स्थानीय निवासी महिलाओं ने रोष जताते हुए कहा, यहाँ जरा सा भी सीमेंट इस्तेमाल नहीं हुआ है, सिर्फ रेत और मिट्टी का खेल है। अगर सोते समय यह छत हमारे बच्चों पर गिर गई, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?

सीलन का साम्राज्य, बाल्टियों से पानी फेंक रहे हैं लोग

कॉलोनी में जल निकासी की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। नालियां और सीवर लाइनें अंदर से टूटी और पूरी तरह ब्लॉक हैं। ताजा पानी आने पर वह नालियों से बाहर निकलने के बजाय घरों के अंदर बैक मारता है।
कमरों और रसोई में इस कदर सीलन है कि दीवारें गल रही हैं। पाइपलाइन कहाँ है, किसी को नहीं पता। छतों से पानी टपकता है और हमें रात-रात भर बाल्टियों से पानी भर-भरकर बाहर फेंकना पड़ता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि गंदगी और सीलन की वजह से फ्लैट्स में कीड़े-मकौड़े और छिपकलियों का अंबार लगा हुआ है, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा अलग से मंडरा रहा है।

शिकायत करनी है तो लखनऊ या दिल्ली जाओ

इस बदहाली के खिलाफ जब यहाँ के निवासी गाजियाबाद विकास प्राधिकरण या स्थानीय नगर पालिका के पास जाते हैं, तो उन्हें सिर्फ आश्वासन और ‘फुटबॉल’ की तरह एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर दौड़ाया जाता है। निवासियों ने बताया कि जब वे लोनी नगर पालिका फोन करते हैं तो कहा जाता है कि गाजियाबाद कॉल करो, और गाजियाबाद वाले कहते हैं कि यह लोनी के अंतर्गत आता है। हद तो तब हो जाती है जब कुछ अधिकारी सीधे कह देते हैं, जाकर लखनऊ या दिल्ली शिकायत करो, हम कुछ नहीं करेंगे।
सफाई व्यवस्था का यह आलम है कि पूरी कॉलोनी में एक भी डस्टबिन नहीं है। सफाई कर्मचारी महीनों नहीं आते। निवासियों को अपनी जेब से ₹2600-₹2600 देकर प्राइवेट टैंक मंगाने पड़ते हैं ताकि सीवर का गंदा पानी साफ कराया जा सके। बिजली की खराबी से लेकर हर छोटी-बड़ी मरम्मत का खर्च इन गरीब परिवारों को खुद उठाना पड़ रहा है।

मुफ्त आवास के नाम पर वसूली और आवंटन का ‘घोटाला’

इस योजना में सिर्फ निर्माण का ही भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि आवंटन में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। सरकार की तरफ से यह फ्लैट्स गरीबों को मुफ्त या बेहद मामूली दर पर आवंटित किए जाने थे, लेकिन यहाँ रह रहे लोगों ने प्रशासनिक मिलीभगत का एक बड़ा पर्दाफाश किया है।
कब्जा पत्र मिला, आवंटन नहीं: कई परिवारों को केवल कब्जा पत्र थमा दिया गया है, लेकिन आधिकारिक आवंटन पत्र आज तक नहीं मिला।

हजारों रुपये की रिश्वतखोरी: एक पीड़ित परिवार ने रोते हुए बताया कि मनोज नाम के एक पटवारी और अन्य दलालों ने आवंटन के नाम पर उनसे किश्तों में करीब ₹1.5 लाख से ₹2 लाख तक ऐंठ लिए।

लेटर देकर वापस छीना: पीड़ितों का आरोप है कि गाजियाबाद नगर निगम दफ्तर में उन्हें आवंटन पत्र दे दिया गया था, लेकिन तभी एक पुलिसकर्मी ने आकर अधिकारी के कान में कुछ कहा और उनका लेटर वापस छीनकर कह दिया गया कि “आपका आवंटन कैंसिल हो गया है।

पार्क बना तबेला और कबाड़खाना

बच्चों के खेलने और टहलने के लिए जो पार्क आरक्षित किया गया था, उसकी स्थिति भी दयनीय है। पार्क की न तो कोई बाउंड्री वॉल है और न ही कोई सुरक्षा। स्थानीय रसूखदार लोगों ने इस पार्क पर कब्जा कर रखा है, जहाँ वे अपने ट्रैक्टर-ट्रॉली, खेती-किसानी के औजार और भारी सामान लाकर खड़े कर देते हैं। बच्चे कचरे और लोहे के भारी औजारों के बीच खेलने को मजबूर हैं, जिससे हमेशा दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को कौन लगा रहा पलीता?

यह पूरी योजना 2015 में अखिलेश यादव की तत्कालीन सपा सरकार के दौरान बनी थी और इसका आवंटन 2017 में भाजपा सरकार के आने के बाद हुआ। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जीडीए के आला अधिकारियों को इन गरीबों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं? भ्रष्टाचार की यह इमारत कभी भी भरभरा कर गिर सकती है और कई मासूमों की जान ले सकती है।
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या इस ग्राउंड रिपोर्ट के बाद कुंभकर्णी नींद में सोए अधिकारियों की आंखें खुलेंगी और इन जर्जर फ्लैटों का कायाकल्प कर इन गरीबों को न्याय मिलेगा? यह देखना अभी बाकी है।

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