बतंगड़ स्पेशल
अपराधियों के दिलों में खौफ पैदा करने वाला वह नाम, जिसका मूल मंत्र था ‘ऑपरेशन उजागर’
इंदौर। अपराध की दुनिया में मर्डर सबसे बड़ा अपराध माना जाता है। यदि कोई हत्या का मामला अनसुलझा रह जाए, तो वह न केवल पुलिस के लिए एक विफलता है बल्कि हमारी पूरी न्याय प्रणाली पर भी एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। ऐसे ही कई वर्षों से धूल खा रहे ‘अंधे कत्ल’ के मामलों की फाइलों को दोबारा खोलकर उन्हें अंजाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाने वाले मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (डीजी जेल) वरुण कपूर ने हाल ही में विशेष चर्चा में अपने अनुभवों, जेल के सच और अपराधियों की मानसिकता को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए।
क्या है ‘ऑपरेशन उजागर’?
जब बरसों पुरानी धूल खाती फाइलों से बाहर आया सच
साक्षात्कार के दौरान वरुण कपूर ने बताया कि ‘ऑपरेशन उजागर’ (जिसे बाद में मिशन उजागर भी कहा गया) एक ऐसा अनूठा प्रयोग था जिसके तहत उन बंद हो चुके हत्या के मामलों को दोबारा खोला जाता है, जो किसी कारणवश सुराग न मिलने पर ठंडे बस्ते में डाल दिए गए थे।
इसकी शुरुआत साल 1995 में इंदौर से हुई थी, जब वरुण कपूर वहां बतौर एसपी सिटी पदस्थ थे। उस समय 5 साल पुराना एक मामला सामने आया था, जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की हत्या कर शव को अपने ही आंगन में दफना दिया था और पुलिस में केवल अपहरण की रिपोर्ट दर्ज थी। वरुण कपूर और उनकी टीम ने अतिरिक्त प्रयास कर इस बेहद चुनौतीपूर्ण केस को सुलझाया। इसके बाद उन्होंने जहां भी काम किया (चाहे वह एसपी, डीआईजी या आईजी के रूप में हो), इस मुहिम को जारी रखा और लगभग 110
अनसुलझे मर्डर केस को उजागर किया।
जब पुराना अपराधी पकड़ा जाता है, तो पीड़ित परिवार को वर्षों बाद एक संतोष मिलता है और समाज में यह कड़ा संदेश जाता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे हैंचाहे 5 साल बीतें या 10 साल, अपराधी बच नहीं सकता।
जेल का सच: क्या बड़े अपराधियों को मिलता है वीआईपी ट्रीटमेंट?
सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में अक्सर यह कहा जाता है कि जेलों में बड़े और खूंखार अपराधियों को फाइव स्टार जैसी सुविधाएं, एसी कमरे या स्विमिंग पूल मिलते हैं। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए वरुण कपूर ने इसे पूरी तरह से एक ‘मिथक’ करार दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश की जेलों में ऐसा कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता। अपराधियों की सजा के आधार पर उन्हें अलग-अलग जेलों में रखा जाता है:
सब जेल : तहसील स्तर पर, जहां 5 साल से कम सजा वाले कैदी रहते हैं।
जिला जेल: जिला स्तर पर, जहां 5 से 10 साल तक की सजा वाले कैदी रहते हैं।
सेंट्रल जेल : जहां 10 साल से ऊपर या आजीवन कारावास वाले गंभीर अपराधी रहते हैं।
भोपाल सेंट्रल जेल जैसी जगहों पर बने ‘हाई सिक्योरिटी प्रिज़न’ में खूंखार अपराधियों, आतंकवादियों और नक्सलियों को बेहद कड़ी निगरानी और ‘सॉलीट्रिट्री’ (अकेली सेल) में रखा जाता है, जहाँ बाहरी दुनिया या किसी विशेष सुविधा का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि, उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि कभी-कभी सुरक्षा दीवारों के ऊपर से फेंककर या अन्य तरीकों से तंबाकू, सिगरेट या मोबाइल फोन जैसी चीजें अंदर पहुंचाने की कोशिशें होती हैं, जिन्हें जेल प्रशासन तलाशी अभियानों के जरिए कड़ाई से नाकाम करता है।
अपराधी की मानसिकता: आंसू बहाने से अपराध कम नहीं होता”
एक अनुभवी पुलिस अधिकारी के तौर पर वरुण कपूर का मानना है कि अपराध करना इंसान के स्वाभाविक स्वभाव के विपरीत एक असामान्य घटना है। उन्होंने अपने पूरे करियर का अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने आज तक ऐसा कोई अपराधी नहीं देखा जिसे अपने किए पर कभी न कभी ग्लानी या शर्म महसूस न हुई हो।
पूछताछ के दौरान जब अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव में टूटता है और उसकी आँखों से आंसू निकलते हैं, तब पुलिस को यह भरोसा होता है कि अब वह सच बोल रहा है। लेकिन एक इंसान के तौर पर क्या पुलिस को उन आंसुओं पर दया आती है? इस पर वरुण कपूर ने स्पष्ट किया, अपराधी के आंसू की कानून के सामने कोई वैल्यू नहीं है। उसके आंसू बहाने से किसी मासूम की गई हुई जिंदगी वापस नहीं आ सकती। हमारे लिए वे आंसू कोई दुख का कारण नहीं, बल्कि इस बात का संतोष होते हैं कि हम सही टारगेट पर पहुंच गए हैं और सच बाहर आ गया है।
वर्दी और परिवार का संतुलन
एक पुलिस अधिकारी की 24 घंटे की तनावभरी नौकरी और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन बनाना कितना मुश्किल है, इस पर भी उन्होंने खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि पुलिस का काम हर चीज और हर इंसान पर शक करने का होता है, घटनास्थल पर पड़ी एक सिगरेट से लेकर संदिग्ध व्यक्तियों तक। लेकिन इस ‘पेशेवर शक’ की आदत को घर के दरवाजे पर ही छोड़ना पड़ता है।
उन्होंने कहा, आप अपने बच्चों या जीवनसाथी पर शक नहीं कर सकते। मैं हमेशा अपने काम को दफ्तर या फील्ड तक ही सीमित रखता था और उसे घर लेकर नहीं आता था। हालांकि आधी रात को भी फोन आने पर तुरंत ड्यूटी पर लौटना पड़ता है, जो बेहद चुनौतीपूर्ण है, लेकिन संकट के समय जनता की सुरक्षा करना और उन्हें यह भरोसा दिलाना कि वे सुरक्षित हैं, सबसे बड़ा संतोष देता है।”
सेलिब्रिटी कैदियों के लिए जेल के नियम
जब कोई बड़ी हस्ती या सेलिब्रिटी जेल जाता है, तो क्या उनके लिए नियम बदल जाते हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जेल मैनुअल पूरी तरह से कोडिफाइड है। इसमें कैदी को मिलने वाले खाने के वजन से लेकर हर छोटी सुविधा तय होती है, जो सबके लिए एक समान है। अंतर सिर्फ इतना होता है कि किसी सेलिब्रिटी की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना पड़ता है ताकि जेल में बंद अन्य कैदियों से उन्हें कोई शारीरिक हानि न पहुंचे।

You must be logged in to post a comment Login