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चमकते होर्डिंग्स के पीछे छिपती मरुधरा की प्यास

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बाड़मेर। राजस्थान को आज वैश्विक पटल पर एक ‘विकसित राजस्थान’ के तौर पर पेश किया जा रहा है। जयपुर से दिल्ली तक जाने वाले नेशनल हाईवे और चमचमाती सड़कों पर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के बड़े-बड़े होर्डिंग्स इस बात का दावा करते हैं कि विकास हर घर की दहलीज तक पहुंच चुका है। लेकिन इन दावों की असल हकीकत देखनी हो, तो राजधानी की चकाचौंध से दूर मारवाड़ के रेतीले धोरों के बीच बसे गांवों का रुख करना होगा। बाड़मेर के बायतू क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में आज भी विकास की गाड़ी पानी की किल्लत और प्रशासनिक बेरुखी के रेतीले गड्ढे में फंसी नजर आती है। यहाँ आधुनिकता की बातें तो बहुत हैं, लेकिन बुनियादी जरूरतें आज भी सुदूर अतीत के भरोसे जी रही हैं।

मरुभूमि की असली जीवनरेखा

इस पूरे भौगोलिक भूभाग को देखने पर सिर्फ रेत ही रेत नजर आती है। भीषण विपरीत परिस्थितियों और मानसूनी अनिश्चितताओं के बीच यहाँ के लोगों की पूरी जिंदगी आज भी एक पारंपरिक जलस्रोत ‘टांके’ के इर्द-गिर्द घूमती है। स्थानीय भाषा में ‘टांका’ कहे जाने वाले इस पारंपरिक जल संचयन ढांचे की गहराई करीब 12 से 13 फीट होती है, जिसे सीमेंट के प्लास्टर से पक्का कर ऊपर से पैक कर दिया जाता है। इसके चारों तरफ एक ढालू हिस्सा होता है जिसे ‘आगोर’ कहा जाता है। जब भी बारिश होती है, तो आगोर से बहकर पानी इस टांके में जमा हो जाता है।

स्थानीय पत्रकार चंदन चौधरी बताते हैं, यहाँ की परिस्थितियाँ हमेशा से अभावों से भरी रही हैं। अगर मानसून के दौरान समय पर बारिश नहीं होती है, तो स्थितियां भयानक हो जाती हैं। लेकिन यदि एक अच्छी बारिश भी हो जाए, तो यह टांका पूरे पानी से भर जाता है और महीनों तक लोगों की प्यास बुझाता है। जल जीवन मिशन जैसे करोड़ों-अरबों रुपयों के प्रोजेक्ट्स के दावे सिर्फ कागजों और होर्डिंग्स तक सीमित हैं, धरातल पर आज भी लोगों की जीवनरेखा यही टांका है।

80 हजार करोड़ की रिफाइनरी और स्थानीय युवाओं के टूटे सपने

पश्चिमी राजस्थान की इस मरु-मिट्टी में स्थापित हुआ रिफाइनरी प्रोजेक्ट इस पूरे क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा था। लगभग 80,000 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मेगा प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। जब इस परियोजना की नींव रखी गई, तब यहाँ के युवाओं ने सोचा था कि अब उन्हें रोजगार के लिए पलायन नहीं करना पड़ेगा। कई युवाओं ने इसी आस में तकनीकी शिक्षा की राह चुनी।
परंतु, आज की जमीनी हकीकत यह है कि इतने बड़े पैमाने पर निवेश होने के बावजूद स्थानीय आबादी को इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल सका है। कॉर्पोरेट चकाचौंध के बीच यहाँ का युवा आज भी खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, और उनके रोजगार के सपने तकनीकी फाइलों के नीचे दबे हुए हैं। चंदन चौधरी दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं, बच्चों ने सोचा था कि घर के पास ‘गंगा’ बहकर आई है, लेकिन अफसोस कि यह विशाल प्रोजेक्ट स्थानीय युवाओं के सपनों को हकीकत में नहीं बदल सका।

झोपड़ी में बसती मारवाड़ की आत्मा, सांस्कृतिक धरोहर आज भी जीवित

एक तरफ जहाँ बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं की भारी कमी है, वहीं दूसरी तरफ मारवाड़ अपनी सांस्कृतिक समृद्धि को आज भी सीने से लगाए हुए है। मारवाड़ की असली पहचान यहाँ की पारंपरिक झोपड़ियों से शुरू होती है। आज भले ही लोग आलीशान महलों और बंगलों के ख्वाब देखते हों, लेकिन इस मिट्टी की बुनियाद और जड़ें इन्हीं झोपड़ियों में रची-बसी हैं।
इन पारंपरिक झोपड़ियों की बनावट और वास्तुकला ऐसी है कि यह आधुनिक एयरसी को भी मात देती है। भयंकर गर्मी में भी यह अंदर से बेहद ठंडी रहती है। यहाँ के बुजुर्ग आज भी सीमेंट के पक्के मकानों के बजाय इन झोपड़ियों में वक्त बिताना पसंद करते हैं, क्योंकि यहाँ उन्हें असीम मानसिक सुकून और प्राकृतिक वातावरण मिलता है।

इन झोपड़ियों के दरवाजे भी बांस की खपच्चियों से पारंपरिक तरीके से बनाए जाते हैं, जो एक दौर में यहाँ की सुरक्षा की गारंटी होते थे। तब लोगों की प्राथमिकता सिर्फ इतनी होती थी कि घर में बिल्ली घुसकर दूध न पी जाए, क्योंकि आपसी भाईचारे और भरोसे के कारण चोरी-डकैती का कोई डर नहीं था।

सामाजिक सुधारों की बयार, मगर बुनियादी ढांचा अभी भी दूर

वक्त के साथ इस क्षेत्र ने सामाजिक स्तर पर कई सकारात्मक बदलाव देखे हैं। सरकारी आंकड़े और स्थानीय समाज गवाही देते हैं कि कभी इस क्षेत्र में अभिशाप रही ‘बाल विवाह’ जैसी कुप्रथाएं अब लगभग ना के बराबर रह गई हैं। इसके साथ ही ‘मृत्यु भोज’ जैसी खर्चीली और रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ भी लोगों में भारी जागरूकता आई है। समाज अपनी रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ रहा है, लेकिन प्रशासनिक और ढांचागत विकास की रफ्तार अब भी बेहद धीमी है।

पानी की भारी किल्लत: जल जीवन मिशन के भारी प्रचार के बावजूद कई गांव बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।

सड़कों का अभाव: अंदरूनी ग्रामीण इलाकों में आज भी पक्की सड़कों का निर्माण न होने से सुगम संपर्क का अभाव है।

अधूरी आवास योजनाएं: प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं का लाभ पूर्ण रूप से न पहुंचने से लोग आज भी कच्चे पारंपरिक आवासों में ही रहने को मजबूर हैं।

अंधेरे में कई ढाणियां: बिजली की सामान्य स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन भौगोलिक जटिलता और छितराई आबादी के कारण कई सुदूर ढाणियां आज भी बिजली से वंचित हैं।

मेहमाननवाज़ी बेमिसाल, पर कब बुझेगी प्यास?

मारवाड़ अपने खुले दिल, अनूठी मेहमाननवाज़ी और बेमिसाल सामाजिक सरोकारों के लिए जाना जाता है। यहाँ की मिट्टी में अपनत्व है, लेकिन यहाँ के लोगों के हिस्से में आज भी अंतहीन इंतजार लिखा है। जयपुर और दिल्ली के नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि किसी प्रदेश का वास्तविक विकास केवल राजमार्गों पर लगे विज्ञापनों से तय नहीं होता। विकास तब माना जाएगा जब सुदूर बायतू की अंतिम ढाणी में बने पारंपरिक टांके के सूखने से पहले, सरकारी नल से पानी की धार फूट पड़ेगी और यहाँ के युवाओं के तकनीकी डिप्लोमा को रिफाइनरी के गेट के भीतर सम्मानजनक रोजगार मिलेगा।

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