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विकास के दावों के बीच सुबकता बुंदेलखंड: चित्रकूट के गांवों में ‘ज़िंदगी’ नहीं, सिर्फ़ ‘सांसें’ काट रहे हैं लोग

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चित्रकूट। देश में जहाँ एक तरफ़ डिजिटल इंडिया और बुलेट ट्रेन की बातें हो रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के पास बसे चित्रकूट के ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। यहाँ के लोग आज विकास की मुख्यधारा से इतने कटे हुए हैं कि उनके लिए “लोकतंत्र” सिर्फ़ पांच साल में एक बार वोट देने का जरिया बनकर रह गया है। पथरीले रास्तों, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और भयंकर गरीबी के बीच यहाँ के ग्रामीण अपनी ज़िंदगी जी नहीं रहे हैं, बल्कि सिर्फ़ काट रहे हैं।

एंबुलेंस नहीं आती, मेरे बच्चे ने खाट पर ही दम तोड़ दिया

ग्रामीणों का दर्द तब आंसुओं के रूप में छलक पड़ा जब एक लाचार पिता ने अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया, मेरे छोटे से बच्चे के पेट में दर्द हुआ था। यहाँ एंबुलेंस नहीं आ सकती क्योंकि सड़क ही नहीं है। हम उसे ऑटो रिक्शा से मानिकपुर अस्पताल ले गए, लेकिन वहाँ सुविधाओं के अभाव में मेरे बच्चे ने खटिया के पास ही दम तोड़ दिया। अस्पताल वाले रोज कल आना, कल आना कहते रहे।
यहाँ से सबसे नजदीकी अस्पताल लगभग 15 से 20 किलोमीटर दूर है। गाँव में यदि कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे अस्पताल तक ले जाने के लिए आज भी छोटी चारपाई को कांधे पर उठाना का सहारा लेना पड़ता है। मुख्य सड़क तक पहुँचने के लिए मरीजों को 3 किलोमीटर का सफर इस बदहाल पगडंडी पर तय करना पड़ता है। एंबुलेंस ड्राइवरों को इस गाँव का लोकेशन तक नहीं पता होता; वे इसे ‘जंगल’ कहकर आने से मना कर देते हैं।
पांच साल में सिर्फ़ सड़क की नाप होती है, बजट कहाँ जाता है पता नहीं
गाँव के एक बुजुर्ग ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, हमारे बाप-पुरखा इसी जंगल में रहकर मर गए, लेकिन विकास आज तक नहीं हुआ। हर पंचवर्षीय योजना में अधिकारी आते हैं, सड़क की नाप लेकर चले जाते हैं, लेकिन सड़क कभी नहीं बनती। बरसात में यहाँ गांठे-गांठे (घुटनों तक) कीचड़ और पानी भर जाता है, जिससे पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। यहाँ तारकोल की सड़क नहीं, सिर्फ़ रेत ही रेत है।
पानी की समस्या भी यहाँ विकराल है। ‘नमामि गंगे’ योजना के तहत पाइपलाइन तो बिछी है, लेकिन पानी सिर्फ़ सुबह दो घंटे और शाम को एक घंटे ही आता है वह भी कभी-कभी गायब रहता है। 42 डिग्री की इस झुलसा देने वाली गर्मी में ग्रामीणों के पास कपड़े धोने और नहाने तक के लिए पर्याप्त पानी नहीं है।

स्लोगन्स डज नॉट रिमूव पॉवर्टी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का यह नारा आज भी चित्रकूट के इन सुदूर गांवों पर सटीक बैठता है। ग्रामीणों का आरोप है कि चाहे मौजूदा सरकार हो, पिछली सरकार हो या विपक्षnगरीबों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। अपनी जायज मांगों (सड़क और पीएम आवास) के लिए ग्रामीणों को आपस में चंदा इकट्ठा करके धरना-प्रदर्शन करने जाना पड़ता है, जहाँ उन्हें ‘पिछड़ी जाति’ का कहकर अनसुना कर दिया जाता है।

2026 में भी ‘स्वदेश’ मूवी जैसा मंजर, 10 रुपये के लिए जान जोखिम में डालता बचपन

यह दृश्यावली साल 2004 में आई शाहरुख़ ख़ान की फिल्म ‘स्वदेश’ की याद दिलाती है, जहाँ एक बच्चा ट्रेन में पानी बेचता था। आज साल 2026 में भी हकीकत रत्ती भर नहीं बदली है।
गाँव के छोटे-छोटे बच्चे और महिलाएं इस 42 डिग्री तापमान की कड़कती धूप में, 3 किलोमीटर दूर रेलवे ट्रैक पर जाकर ₹10 में पानी का कुप्पा (बोतल) बेच रहे हैं। जिस उम्र में इन बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिए थीं, उस उम्र में वे परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए मज़बूर हैं। एक छोटी बच्ची, जिसकी तबीयत भी खराब लग रही थी, ने मासूमियत से कहा, “अब तो इस धूप और गर्मी की आदत हो गई है। रोज पानी बेचने आते हैं ताकि घर चल सके।” इसे बाल श्रम कहें या पेट भरने की मज़बूरी, लेकिन यह इस देश के माथे पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

कब जागेगा प्रशासन?

वोट बैंक के समय तो नेता इन गलियों के चक्कर काटते हैं, लेकिन चुनाव जीतते ही ये इलाके सरकारी नक्शों से गायब हो जाते हैं। जब तक धरातल पर सड़कें, अस्पताल और रोजगार की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुँचतीं, तब तक आज़ादी और विकास के सारे दावे इन ग्रामीणों के लिए बेमानी ही रहेंगे। चित्रकूट के इन गांवों की चीख आख़िर कब तक सत्ता के गलियारों में अनुगुंजित होती रहेगी?

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