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बीजेपी मुख्यालय से महज़ 100 मीटर दूर ‘अवैध’ आशियाने: कनॉट प्लेस के पीछे झुग्गियों में बसती बेबसी और दावों की हकीकत

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नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस के ठीक पीछे, मिंटो रोड और पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर विकास और व्यवस्था के विरोधाभास की एक ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है, जो चौंकाने वाली है। एक तरफ़ जहाँ महज़ 100 मीटर की दूरी पर देश की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का भव्य राष्ट्रीय मुख्यालय है, वहीं दूसरी तरफ़ प्रसिद्ध काली मंदिर के ठीक बगल में सालों से अवैध रूप से बसी 15-20 झुग्गियों की एक पूरी कतार है। इन झुग्गियों में रहने वाले लोग दिल्ली की इस सबसे महंगी और वीवीआईपी ज़मीन पर बिना बिजली-पंखे के, सिर्फ़ अपनी किस्मत के भरोसे दिन काट रहे हैं। हाल ही में इन झुग्गियों को खाली कराने के सरकारी नोटिस के बाद यहाँ के बाशिंदों में हड़कंप मचा हुआ है।

10,000 का किराया कहाँ से दें बाबू?

अखबारों और ख़बरों में इन अवैध झुग्गियों को हटाए जाने की सुर्खियाँ तैर रही हैं। यहाँ रहने वाले अधिकांश लोग बिहार और उत्तर प्रदेश से रोजी-रोटी की तलाश में आए प्रवासी हैं। बिहार के मोतिहारी जिला की रहने वाली रामभा देवी पिछले 20 साल से इसी झुग्गी में अपने परिवार के साथ रह रही हैं। वे कहती हैं, “यहाँ गैस जलाकर दो रोटी बना लेते हैं और थोड़ा-बहुत खाना बेचकर ₹40 प्रति प्लेट के हिसाब से कुछ कमा लेते हैं। पति रिक्शा चलाते हैं। लोग कहते हैं कि सरकार भगा देगी, लेकिन क्या करें बाबू? हमारे पास अपना तो कुछ है नहीं। दिल्ली में ₹10,000 महीना किराया कहाँ से देंगे? बच्चे हैं, बीमारी है, दुख है सब इसी में देखना पड़ता है।
इंदिरा आवास या सरकारी मकानों के सवाल पर ग्रामीण व्यवस्था की पोल खोलते हुए वे कहती हैं कि गाँव के मुखिया और सरपंच जिसे चाहते हैं उसे ही आवास योजना का लाभ दिलवाते हैं, हम जैसे गरीबों की कोई नहीं सुनता। यहाँ तक कि पीने और इस्तेमाल करने का पानी भी इन लोगों को ₹40 से ₹50 देकर टैंकरों से खरीदना पड़ता है।

किराए के ₹3000 बचाने के लिए ‘अवैध कब्ज़े’ को मजबूरी का नाम

उत्तर प्रदेश से आकर यहाँ गाड़ी चलाने वाले इकरार से जब पूछा गया कि उन्होंने रहने के लिए सरकारी ज़मीन को क्यों चुना, तो उन्होंने साफ़गोई से कहा, “यहाँ कमरा लेने से अच्छा है, किराया नहीं देना पड़ता और हर महीने ₹3000 बच जाते हैं। सरकारी ज़मीन है, यह बात तो ठीक है, लेकिन गरीबी में पैसे बच रहे हैं तो रह रहे हैं। सरकार भगाएगी तो भागना ही पड़ेगा, विद्रोह थोड़े ही करेंगे।”
वहीं बेगूसराय के मोहम्मद मुस्तफा पिछले 30 सालों से दिल्ली में रिक्शा चला रहे हैं। उनका परिवार बवाना में किराए के मकान में रहता है, जहाँ वे हफ्ते में एक बार जाते हैं। मुस्तफा का कहना है कि जब झुग्गी वालों को पक्के मकान मिल रहे थे, तब राजनीतिक पहुंच न होने के कारण उन्हें कोई मकान नहीं मिला, जिसके कारण वे आज भी किराए के जाल में फंसे हैं और दिन में यहाँ झुग्गियों के सहारे गुज़ारा करते हैं।

वीवीआईपी इलाके की नाक के नीचे नशा और पुलिस पर ‘हफ्ताखोरी’ का संगीन आरोप

पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग की इस पट्टी पर केवल बेबसी ही नहीं, बल्कि क़ानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ता एक और काला पहलू भी है। स्थानीय युवाओं और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, नई दिल्ली के इस पॉश इलाके की झुग्गियों में शाम ढलते ही असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लग जाता है।
एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, इन झुग्गियों में दारू-पानी तो आम बात है, यहाँ गांजा और चरस जैसे नशे धड़ल्ले से बिकते हैं। पुलिस वाले सब जानते हैं, लेकिन वे कुछ नहीं करते। पुलिस वाले हर हफ्ते कमीशन खाते हैं। उनको ₹10,000-₹20,000 का हफ्ता चला जाता है, जिससे उनका मुंह बंद हो जाता है।” दिन के समय यहाँ सन्नाटा पसरा रहता है क्योंकि सभी रिक्शेवाले और मज़दूर काम पर गए होते हैं, लेकिन अंदर रखे गैस सिलेंडर, चूल्हे और बिस्तरों की कतारें अवैध कब्ज़े की पुख्ता गवाही देती हैं।

सिस्टम की लाचारी या गरीबी का अंतहीन चक्र?

शाम होते ही इन 15-20 झुग्गियों में चूल्हे सुलगने लगते हैं और रिक्शों की कतारें लग जाती हैं। प्रशासन द्वारा खाली करने के लिए दी गई दो-चार दिनों की मोहलत की तलवार इन पर लटक रही है। यह ग्राउंड रिपोर्ट साफ़ दर्शाती है कि देश के सबसे सुरक्षित और रसूखदार इलाके में भी गरीबी, मज़बूरी, अवैध कब्ज़ा और भ्रष्टाचार का एक ऐसा नेटवर्क चल रहा है, जिससे आँखें मूंदना अब प्रशासन के लिए मुमकिन नहीं होगा। देखना यह है कि नोटिस की अवधि ख़त्म होने के बाद क्या इन बेघरों को कोई वैकल्पिक ठिकाना मिलता है या यह बेबसी दिल्ली की किसी दूसरी सड़क पर जाकर फिर से तिरपाल तान लेगी।

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