देश
रेगिस्तान में बेड़ियों से जकड़ा बचपन, अंधविश्वास और अभाव के बीच घुटती दिव्यांग बेटी की चीखें
बाड़मेर। तपती धूप, उड़ती रेत और पैरों में लोहे की भारी बेड़ियां… यह किसी अपराधी की दास्तान नहीं, बल्कि राजस्थान के थार रेगिस्तान के एक सुदूर गांव में रहने वाली 25 वर्षीय एक दिव्यांग और मानसिक रूप से विक्षिप्त बेटी की खौफनाक हकीकत है। जिसे समाज और तंत्र की नाकामी कहें या परिवार की मजबूरी, यह मासूम लड़की सालों से इंसानी बस्तियों से दूर, एक जानवर की तरह जंजीरों से बंधी अपनी जिंदगी काटने को मजबूर है।
रेत पर घिसटने के कारण इस बेटी के पैर पूरी तरह से छिल चुके हैं। उसे एक अलग स्थान पर रखकर सिर्फ समय पर खाना-पानी दे दिया जाता है। वह न तो अपनों से घुल-मिल सकती है और न ही आज तक किसी स्वास्थ्य केंद्र की दहलीज देख पाई है।
अस्पताल से ज्यादा ओझा-भोपा पर भरोसा
इस क्षेत्र में यह कोई इकलौता मामला नहीं है। ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के अभाव और जागरूकता की कमी के कारण आज भी मानसिक बीमारी को ‘ऊपरी हवा’ या ‘दैवीय प्रकोप’ मान लिया जाता है। लोग अस्पताल जाने के बजाय भोपा और झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं।
स्थानीय लोगों और मामलों को कवर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक, यहाँ अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अगर किसी मरीज को अस्पताल पहुंचा भी दिया जाए, तो परिवार वाले चार-पांच दिन में ही धैर्य खो देते हैं। वे डॉक्टरों से यह कहकर छुट्टी मांगते हैं कि ‘हमें भोपा जी के पास या मंदिर जाना है।’ दुखद पहलू यह भी है कि कई मामलों में विक्षिप्तों को आजीवन खेजड़ी के पेड़ों से बांधकर छोड़ दिया जाता है, जहां वे धूप, बारिश और हर मौसम की मार झेलते हुए दम तोड़ देते हैं।
गरीबी और लाचारी का दोहरा थपेड़ा
इस पीड़ित बेटी के पिता खुद भी अस्वस्थ रहते हैं और परिवार अत्यंत गरीब है। जब उनसे बात की गई तो उनकी आंखों के आंसू और लाचारी साफ बयां हो रही थी। पिता ने रूंधे गले से कहा, मेरी उम्र ढल रही है, खुद की तबीयत ठीक नहीं रहती। हम बेहद गरीब हैं, अस्पताल का भारी-भरकम खर्चा कहाँ से उठाएंगे? इतने सालों से इस तड़प को देख रहे हैं, पर हमारी कोई बिसात नहीं।
सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत आज भी डरावनी है। जब तक हर जिला मुख्यालय पर मौजूद चिकित्सा सुविधाएं इन दूर-दराज के गांवों तक खुद चलकर नहीं पहुंचेंगी, तब तक कई और जिंदगियां इन जंजीरों में ही दम तोड़ देंगी।

खोखली व्यवस्था के बीच उम्मीद की नई किरण, विधिक सेवा की पहल
इस दर्दनाक कहानी के बीच अब उम्मीद की एक किरण दिखाई दी है। इस मामले को उजागर करने वाली मीडिया टीम और ‘जिला विधिक सेवा प्राधिकरण’ से जुड़े एक पीएलवी ने संयुक्त रूप से परिवार को ढांढस बंधाया है। पीएलवी ने बताया, हर जिला मुख्यालय पर सरकार द्वारा ऐसी निशुल्क और मुकम्मल व्यवस्थाएं हैं। अगर परिवार इजाजत दे, तो घर तक सरकारी एंबुलेंस आएगी। बच्ची का पूरा इलाज निशुल्क होगा और यदि परिवार वहां रुकने में असमर्थ है, तो नर्सिंग स्टाफ उसकी पूरी देखभाल करेगा।
माता-पिता ने दिया वचन, अब इलाज के लिए नहीं रोकेंगे
लंबी काउंसिलिंग और आश्वासन के बाद, आखिरकार बच्ची के माता-पिता भावुक हो गए और उन्होंने अपनी बेटी को इलाज के लिए भेजने की अनुमति दे दी है। टीम के सदस्यों ने परिवार से वचन लिया कि वे अब अंधविश्वास के बहकावे में आकर इलाज के बीच में बाधा नहीं बनेंगे।
अब प्रशासन और विधिक सेवा आयोग की टीम इस बेटी को रेस्क्यू कर अस्पताल पहुंचाने की तैयारी में है। उम्मीद की जा रही है कि सालों से बेड़ियों में जकड़ी यह जिंदगी जल्द ही इस नर्क से आजाद होगी और अपने पैरों पर चलती हुई वापस अपने परिवार के बीच लौटेगी।
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