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वादों का ‘बुलडोजर’: दिल्ली के शालीमार बाग में जमींदोज हुए 242 आशियाने, पासवान समाज दाने-दाने को मोहताज
नई दिल्ली। चुनाव के समय वोट मांगने के लिए नेता जी दिन में दस बार आते थे। कसम खाई गई थी कि झुग्गी नहीं टूटने देंगे। लेकिन जैसे ही सरकार बनी, हमारे आशियाने पर बुलडोजर चला दिया गया। आज चार-पांच दिनों से हमारे बच्चे भूखे-प्यासे धूप में तड़प रहे हैं, पर हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है। यह रुआंसी आवाज दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में मलबे के ढेर पर बैठी एक बेसहारा महिला की है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले शालीमार बाग में पिछले दिनों एक प्रशासनिक कार्रवाई के तहत करीब 242 झुग्गियों को ध्वस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई ने यहाँ दशकों से रह रहे पासवान समाज के सैकड़ों गरीब परिवारों को एक ही झटके में सड़क पर ला खड़ा किया है। यह वही समाज है, जिसके नेता चिराग पासवान वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं।

बिना नोटिस दो घंटे में उजाड़ी दुनिया
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें अपना सामान समेटने तक का मौका नहीं दिया गया। स्थानीय निवासी जवाहर पासवान ने नम आंखों से बताया, प्रशासन ने कोई औपचारिक नोटिस नहीं दिया। जब बुलडोजर आया, तब अधिकतर लोग काम पर गए हुए थे। सिर्फ दो घंटे का समय दिया गया। महिलाएं और बच्चे चीखते रहे, लेकिन किसी ने एक न सुनी।
फिलहाल यह पूरा इलाका मलबे के मैदान में तब्दील हो चुका है। दिल्ली में पड़ रही 45 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में ये परिवार बिना पानी, बिना बिजली और बिना भोजन के तिरपाल तानकर रहने को मजबूर हैं। रात के समय मच्छरों के आतंक और सुरक्षा के अभाव के कारण छोटे बच्चों की जान खतरे में है।

अपनों से ही मिला ‘विश्वासघात’
इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि पीड़ित लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उजाड़े गए अधिकांश लोग बिहार के समस्तीपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को अपना आदर्श मानते आए हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि चुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार रेखा गुप्ता के पक्ष में वोट मांगने के लिए खुद चिराग पासवान और स्थानीय नेताओं ने बड़े-बड़े वादे किए थे। एक पीड़ित ने
आक्रोश जताते हुए कहा, हमसे कहा गया था कि रेखा गुप्ता को मतदान कीजिए, ‘जहां झुग्गी, वहीं मकान’ बनेगा। हमने सपना सजाया था कि हमारा आशियाना सुरक्षित रहेगा। लेकिन आज झुग्गी तो दूर, मैदान बचा है। हमारे साथ सीधा विश्वासघात हुआ है।
चिराग भैया! खुद नहीं आ सकते, तो किसी को मदद के लिए तो भेजो
मलबे के बीच भूख से बिलखते बच्चों को संभाल रही महिलाओं ने केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान से भावुक अपील की है। उन्होंने कहा, चिराग भैया से हमारी यही विनती है कि अगर आप व्यस्तता के कारण खुद यहाँ नहीं आ सकते, तो कम से कम अपने किसी अधिकारी या आदमी को भेजकर हमारी इस विकट समस्या का हल करवाइए। हमारे पास खाने का एक दाना नहीं है। इसके साथ ही ग्रामीणों ने चेतावनी भी दी कि अगर यहाँ उनकी सुध नहीं ली गई, तो वे बिहार तक इस अनदेखी का पुरजोर विरोध करेंगे।
₹4000 कमाने वाले कहाँ से दें ₹9000 किराया?
इस बेदखली ने इन परिवारों के सामने आजीविका का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। यहाँ रहने वाली अधिकांश महिलाएं घरों में चौका-बर्तन का काम करती हैं और पुरुष दिहाड़ी मजदूर हैं। इनकी मासिक आय बमुश्किल 4 से 6 हजार रुपये है। बेघर होने के बाद जब ये लोग आसपास के इलाकों में कमरा ढूंढने जा रहे हैं, तो मकान मालिक 8 से 9 हजार रुपये प्रति महीना किराया मांग रहे हैं। कमरतोड़ महंगाई और महंगे गैस सिलेंडर के इस दौर में इन गरीबों के सामने अब जीने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

मानवीय गरिमा पर बड़ा सवाल
बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था या मुआवजे के इस तरह सैकड़ों परिवारों को उनके आशियाने से बेदखल कर देना किसी भी संवेदनशील समाज में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। स्थानीय समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि, पीड़ित परिवारों के लिए तुरंत आपातकालीन भोजन और पेयजल की व्यवस्था की जाए।
छोटे बच्चों और बीमार बुजुर्गों के लिए चिकित्सा शिविर लगाया जाए।
‘जहां झुग्गी, वहीं मकान’ के वादे के तहत इन परिवारों को तुरंत सरकारी आवास या उचित मुआवजा मुहैया कराया जाए।
फिलहाल, कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पिसता हुआ यह गरीब समाज न्याय की उम्मीद में खुली आंखों से आसमान की तरफ देख रहा है।
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