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बीकानेर का चमत्कारिक देशनोक मंदिर: जहां चूहों के रूप में पूजे जाते हैं करणी माता के वंशज, ‘काबा’ कहना भी है यहां की परंपरा
बीकानेर। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे आधुनिक नारे जिस सामाजिक समरसता और कल्याण की बात करते हैं, उसकी नींव राजस्थान की धरती पर आज से 700 वर्ष पहले ही रख दी गई थी। राजस्थान के बीकानेर से सटे देशनोक में स्थित जगप्रसिद्ध ‘करणी माता मंदिर’ आस्था का एक ऐसा अनूठा केंद्र है, जहां अध्यात्म के साथ-साथ लोक-कल्याण की अविरल धारा बह रही है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां चूहों का साम्राज्य है, जिन्हें यहां ‘चूहा’ कहना अपराध माना जाता है भक्त इन्हें आदरपूर्वक ‘काबा’ कहते हैं।

यमराज और करणी माता का वह वचन, जिससे इंसान बने ‘काबा’
मंदिर के इतिहास और ‘काबा’ बनने के रहस्य के बारे में स्थापित मान्यताओं के अनुसार, करणी माता की बहन गुलाब बाई के पुत्र लक्ष्मण की कोलायत में स्नान के दौरान डूबने से मृत्यु हो गई थी। माता ने जब यमराज से अपने पुत्र के प्राण वापस मांगे, तो यमराज ने नियमों का हवाला देकर मना कर दिया। तब महाशक्ति स्वरूप करणी माता ने यमराज से कहा कि अब से उनके वंशज मृत्यु के बाद यमपुरी नहीं जाएंगे। वे मंदिर में ‘काबा’ के रूप में रहेंगे और जब इस रूप में उनकी मृत्यु होगी, तो वे पुनः मनुष्य रूप में जन्म लेंगे। यही कारण है कि इन काबों को माता का साक्षात वंशज मानकर पूजा जाता है।

ग्रहण और सूतक के नियमों से परे है मां का दरबार
आमतौर पर हिंदू धर्म में ग्रहण, सूतक के समय मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं और पूजा वर्जित होती है। लेकिन करणी माता का यह दरबार इन सभी सांसारिक नियमों से मुक्त है। यह मंदिर प्रतिदिन सुबह 4:00 बजे से लेकर रात 10:00 बजे तक बिना किसी बाधा के खुला रहता है और निरंतर पूजा-अर्चना व प्रसाद का वितरण होता रहता है।
15,000 किलो लापसी और 101 मन मेवे का महाप्रसाद
मंदिर में माता को चढ़ाए जाने वाले विशेष ‘लापसी’ प्रसाद को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद भव्य और पारंपरिक है। उपाध्याय ब्राह्मण ही इस महाप्रसाद को तैयार करते हैं।
लगभग 15,000 किलो वजन की इस लापसी में गेहूं का बाटी, शुद्ध घी, गुड़ और करीब 101 मन (भारी मात्रा में) काजू, बादाम, पिस्ता, किशमिश जैसे मेवे मिलाए जाते हैं।
इस महाप्रसाद का भोग सबसे पहले चांदी के बड़े थाल में माता को लगाया जाता है। इसके बाद इसे चारण समाज के विभिन्न वार्डों में प्रति यूनिट के हिसाब से बांटा जाता है और दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं को डूंगे (दौने) में प्रसाद वितरित किया जाता है।
चढ़ावे से बदल रही है समाज की तस्वीर, निशुल्क कोचिंग और पेंशन योजना
करणी माता का यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि सामाजिक सरोकार का एक बेहतरीन मॉडल भी है। श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन का उपयोग मंदिर ट्रस्ट बेहद पारदर्शी और जन-कल्याणकारी कार्यों में करता है:
निशुल्क शिक्षा और कोचिंग: मंदिर ट्रस्ट की ओर से जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर हर समाज के बच्चों के लिए निशुल्क कोचिंग सेंटर चलाया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि इस छोटे से क्षेत्र से कई युवा प्रतिवर्ष राजस्थान प्रशासनिक सेवा, पुलिस कांस्टेबल, शिक्षक और पटवारी परीक्षाओं में टॉप कर सरकारी सेवाओं में चयनित हो रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण: समाज की बेसहारा और विधवा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और संबल देने के लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा प्रतिमाह 4,000 रुपये की पेंशन राशि दी जाती है।
गौसेवा और शुद्धता: मंदिर की अपनी गौशाला है, जिसमें 600 – 700 गायें हैं। बिना किसी बाहरी अनुदान के ट्रस्ट इनका भरण-पोषण करता है। इसी गौशाला के शुद्ध दूध से ‘काबों’ को भोग लगाया जाता है और पारंपरिक बिलोने के घी से माता की अखंड जोत प्रज्वलित होती है।
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
करणी माता 700 साल पहले ही सांप्रदायिक सद्भावना की बहुत बड़ी प्रेरक थीं। उन्होंने अपने बेटों से ज्यादा बिश्नोई समाज के दशरथ सारंग जी को माना और गायों की रक्षा करने वाले मेघवाल समाज के दशरथ जी को ऊंचा स्थान दिया। आज भी माता की ज्योत के पास दशरथ जी मेघवाल का मंदिर स्थापित है, जो सामाजिक समानता का प्रतीक है।
गर्भ में 21 महीने रहने के बाद अवतार लेने वाली करणी माता की यह पावन धरा आज भी देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल और अगाध श्रद्धा का विषय बनी हुई है। स्वाद, आशीर्वाद और सामाजिक न्याय का यह अनूठा संगम बीकानेर के देशनोक को पूरी दुनिया में अद्वितीय बनाता है।
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