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श्री सीमेंट के साये में सरना गांव पानी में केमिकल, खेतों पर कचरे की परत और पलायन को मजबूर ग्रामीण
ब्यावर। ब्यावर स्थित श्री सीमेंट संयंत्र के आसपास रहने वाले सरना गांव के ग्रामीण इन दिनों अपनी जमीन, पानी और जीवन को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि फैक्ट्री से निकलने वाले धूल-कण, अपशिष्ट और कथित रासायनिक प्रदूषण ने उनके खेतों और जलस्रोतों को प्रभावित किया है। उनका कहना है कि समस्या नई नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही है, लेकिन शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक, इसी मांग को लेकर वे पिछले 13 दिनों से धरने पर बैठे हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं होता, वे आंदोलन खत्म नहीं करेंगे।
पानी पीने लायक नहीं रहा
धरने में शामिल ग्रामीणों ने पानी के दो नमूने दिखाते हुए दावा किया कि गांव में पीने और खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी की गुणवत्ता खराब हो चुकी है। ग्रामीणों का आरोप है कि दूषित पानी के कारण लोगों और पशुओं पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कुछ ग्रामीणों ने सांस संबंधी परेशानी, त्वचा संबंधी समस्याओं और अन्य गंभीर बीमारियों का जिक्र करते हुए दावा किया कि पिछले वर्षों में कई लोगों की मौतें भी हुई हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र चिकित्सकीय या सरकारी जांच से पुष्टि होना अभी बाकी है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पानी के नमूने कई बार जांच के लिए दिए, लेकिन जांच रिपोर्टों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
खेतों में पहुंच रहा फैक्ट्री का अपशिष्ट
ग्रामीणों की शिकायत सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि फैक्ट्री परिसर से लगा अपशिष्ट बरसात के दौरान दीवार पार कर खेतों तक पहुंच जाता है। ग्रामीणों ने ऐसे स्थान भी दिखाए, जहां उनके अनुसार काले रंग का अपशिष्ट और कोयले जैसी सामग्री खेतों में जमा होती है। उनका कहना है कि हर साल दीवार टूटने या बारिश के पानी के बहाव के साथ यह सामग्री खेतों तक पहुंचती है और खेती प्रभावित होती है। कुछ किसानों का दावा है कि प्रदूषण के कारण उन्होंने पिछले 8 से 10 वर्षों से कई खेतों में खेती करना छोड़ दिया है। उनका कहना है कि जब फसल ही नहीं होगी तो बीज, मेहनत और सिंचाई पर खर्च करना भी बेकार है।
पहले फसल होती थी, अब खेत खाली
ग्रामीण बताते हैं कि कभी यही जमीन उनकी आजीविका का मुख्य साधन थी। लेकिन अब कई खेत खाली पड़े हैं। कुछ परिवार गांव छोड़कर ब्यावर शहर में रहने लगे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में कई ऐसे मकान हैं जहां अब कोई नहीं रहता। उनका आरोप है कि लगातार बढ़ती धूल और प्रदूषण की समस्या के कारण कई परिवारों को पलायन करना पड़ा।
कन्वेयर बेल्ट से उड़ती धूल का भी आरोप
ग्रामीणों ने संयंत्र के आसपास मौजूद कन्वेयर बेल्ट की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया कि कोयला और अन्य सामग्री के परिवहन के दौरान उड़ने वाली धूल गांव तक पहुंचती है। एक ग्रामीण ने अपने घर के अंदर जमा काले धूलकण दिखाते हुए कहा कि सफाई के बावजूद घरों में लगातार धूल आती है। ग्रामीणों का कहना है कि गर्मियों के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है।
रोजगार के लिए बाहर मजदूरी करने जाते
प्रदूषण के साथ ग्रामीणों की एक बड़ी शिकायत रोजगार को लेकर भी है। उनका कहना है कि फैक्ट्री गांव के इतने करीब होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा।
कई ग्रामीणों के मुताबिक, परिवार चलाने के लिए युवाओं को बाहर जाकर मजदूरी या कम वेतन वाली नौकरियां करनी पड़ती हैं। हालांकि, आंदोलनकारी ग्रामीणों का कहना है कि उनकी प्राथमिक मांग फैक्ट्री में नौकरी नहीं, बल्कि सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास और जमीन का उचित मुआवजा है।
ग्रामीणों की दो मुख्य मांगें
आंदोलनकारियों ने अपनी मांगों को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन बेचना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि प्रदूषण से प्रभावित जमीन का उचित मुआवजा दिया जाए और उनके मकानों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए।
उनकी प्रमुख मांगें हैं—
- प्रभावित जमीन का उचित मुआवजा दिया जाए।
- वर्तमान मकानों के बदले सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास किया जाए।
- खेती से होने वाले नुकसान का उचित आकलन कर मुआवजा दिया जाए।
- प्रदूषण और जल गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- स्थानीय लोगों की शिकायतों पर प्रशासन और कंपनी की ओर से जवाबदेही तय की जाए।
ग्रामीणों ने प्रशासन पर भी उठाए सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन से शिकायत की, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। उनका कहना है कि जब भी वे अपनी समस्याएं लेकर आगे बढ़ते हैं, मामला बातचीत और आश्वासन तक सीमित रह जाता है। कुछ ग्रामीणों ने स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों पर उनकी आवाज दबाने के आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना बाकी है।
मौके पर पहुंचीं अधिवक्ता ने भी जताई चिंता
जयपुर से मौके का निरीक्षण करने पहुंचीं अधिवक्ता बिस्माद कौर ने भी गांव की स्थिति को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर गांव की स्थिति से जुड़े वीडियो देखने के बाद वे स्वयं यहां पहुंचीं। उनके अनुसार, गांव में धूल और दुर्गंध की स्थिति चिंताजनक है और यहां रहने वाले लोगों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप कर ग्रामीणों की शिकायतों की जांच करनी चाहिए।
सवाल सिर्फ श्री सीमेंट का नहीं, जवाबदेही का भी है
सरना गांव की कहानी केवल एक फैक्ट्री और ग्रामीणों के बीच विवाद के तौर पर नहीं देखी जा सकती। यह सवाल औद्योगिक विकास और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन का भी है। अगर ग्रामीणों के आरोप सही हैं, तो यह जानना जरूरी है कि जल स्रोतों की गुणवत्ता की नियमित जांच कौन कर रहा है, प्रदूषण नियंत्रण के मानक कितने प्रभावी हैं, खेतों को हुए नुकसान का आकलन कैसे किया गया और शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? औद्योगिक विकास रोजगार और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत अगर किसी गांव को दूषित पानी, खराब होती जमीन, धूल और पलायन के रूप में चुकानी पड़े, तो प्रशासन से सवाल पूछना स्वाभाविक है।
सरना के ग्रामीण फिलहाल धरने पर हैं। उनका कहना है कि वे फैक्ट्री बंद कराने की मांग नहीं कर रहे, बल्कि स्वच्छ पानी, सुरक्षित जीवन, जमीन के नुकसान का मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास चाहते हैं। अब देखना यह है कि ग्रामीणों के 13 दिन पुराने धरने के बाद प्रशासन और कंपनी उनकी आवाज सुनती है या फिर यह मामला भी आश्वासन और फाइलों के बीच दबकर रह जाता है।

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