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इंजीनियर बनने की राह छोड़ी, खबरों की दुनिया चुनी: शुभांकर मिश्रा की कहानी
हर करियर की शुरुआत किसी मंजिल से नहीं होती। कई बार शुरुआत एक ऐसे मोड़ से होती है, जहां इंसान को तय करना पड़ता है कि वह वही करे जो दुनिया उससे उम्मीद करती है या वह रास्ता चुने, जिसके लिए उसका मन भीतर से तैयार है। शुभांकर मिश्रा की कहानी इसी मोड़ की कहानी है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई से शुरू हुई उनकी यात्रा आखिरकार पत्रकारिता तक पहुंची और आगे चलकर उन्हें टीवी एंकर, ग्राउंड रिपोर्टर और डिजिटल मीडिया की प्रभावशाली आवाज के रूप में पहचान मिली।
जब इंजीनियरिंग से पत्रकारिता की ओर मुड़ा रास्ता
शुभांकर मिश्रा की शुरुआती दिशा इंजीनियरिंग की ओर थी। उपलब्ध प्रोफाइलों के मुताबिक उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और एक समय उनके सामने एक अपेक्षाकृत तय करियर मौजूद था। लेकिन पत्रकारिता और संवाद की ओर उनका झुकाव धीरे-धीरे इतना मजबूत हुआ कि उन्होंने अपने लिए अलग रास्ता चुनने का फैसला किया।
एक्सचेंज4मीडिया के अनुसार, इंजीनियर बनने की राह पर चल रहे शुभांकर ने आत्ममंथन के बाद पत्रकारिता की ओर रुख किया। यही निर्णय उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी स्थापित रास्ते को छोड़कर अनिश्चित क्षेत्र चुनना केवल करियर बदलना नहीं होता, बल्कि अपने निर्णय पर विश्वास करना भी होता है।
छोटे पर्दे से बड़े न्यूज़रूम तक
पत्रकारिता में आने के बाद शुभांकर मिश्रा ने धीरे-धीरे अपने लिए जगह बनाई। उनका करियर क्षेत्रीय स्तर के समाचार कार्य से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय टीवी पत्रकारिता तक पहुंचा। उन्होंने अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम किया और अनुभव हासिल किया। इस दौरान एंकरिंग के साथ-साथ रिपोर्टिंग और खबरों के पीछे छिपे दूसरे पहलुओं को समझने की क्षमता विकसित हुई।
आज तक की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने एक दशक से अधिक समय में पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई और एंकरिंग के साथ सीनियर स्पेशल करेसपॉन्डेंट की भूमिका में भी काम किया। संस्था ने उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग, खबरों के नए एंगल पहचानने और टीवी डिबेट की प्रस्तुति को उनकी प्रमुख विशेषताओं में गिना है।
सिर्फ स्टूडियो नहीं, जमीन से खबर देखने की कोशिश
पत्रकारिता में कैमरे के सामने दिखाई देना आसान हिस्सा हो सकता है, लेकिन किसी खबर को जमीन पर जाकर समझना अलग चुनौती है। शुभांकर मिश्रा की पत्रकारिता की पहचान में ग्राउंड रिपोर्टिंग एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। आम लोगों से बातचीत, घटनास्थल तक पहुंचना और खबर को केवल बयान या प्रेस रिलीज तक सीमित न रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। यही वजह है कि उनकी पहचान सिर्फ एक न्यूज एंकर तक सीमित नहीं रही।
एक एंकर के रूप में उनकी भूमिका कैमरे के सामने होती है, लेकिन एक रिपोर्टर के रूप में उन्हें सवालों के पीछे की वास्तविकता तलाशनी होती है। दोनों भूमिकाओं के इस मेल ने उनकी पेशेवर पहचान को अलग बनाया।
टीवी से डिजिटल दुनिया तक
भारतीय मीडिया में पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के रूप में आया है। दर्शक अब सिर्फ टीवी स्क्रीन पर समाचार नहीं देखते; वे मोबाइल फोन पर वीडियो, शॉर्ट्स, लाइव बातचीत और लंबी चर्चाओं के जरिए भी खबरों से जुड़ते हैं।
शुभांकर मिश्रा ने इस बदलाव को केवल दर्शक की तरह नहीं देखा, बल्कि स्वयं इसका हिस्सा बने।
उन्होंने डिजिटल माध्यम में अपनी व्यक्तिगत पहचान विकसित की। सोशल मीडिया पर उनका दर्शक वर्ग बढ़ता गया और पत्रकार के साथ-साथ उनकी पहचान एक डिजिटल मीडिया पर्सनैलिटी के रूप में भी मजबूत हुई।
आज तक की प्रोफाइल भी उनके सोशल मीडिया के जरिए दर्शकों से सीधे संवाद को उनकी विशेषता बताती है। यहीं उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण सबक सामने आता है, आज पत्रकारिता में संस्थान महत्वपूर्ण है, लेकिन पत्रकार की अपनी विश्वसनीयता और दर्शकों से सीधा संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण हो चुका है।
डिजिटल लोकप्रियता से प्राइम टाइम तक

डिजिटल माध्यम में मजबूत पहचान बनाने के बाद शुभांकर मिश्रा ने फिर मुख्यधारा के टीवी की ओर कदम बढ़ाया।
2025 में एनडीटीवी से उनके जुड़ने की घोषणा हुई। एक्सचेंज4मीडिया ने बताया कि वह जुलाई 2025 में एनडीटीवी इंडिया के प्राइम टाइम शो का हिस्सा बनने वाले थे।
एनडीटीवी पर उनका कार्यक्रम ‘कचहरी’ जनता से जुड़े मुद्दों, व्यवस्था, भ्रष्टाचार, शिक्षा और सामाजिक समस्याओं जैसे विषयों पर केंद्रित रहा। एनडीटीवी ने इस कार्यक्रम को जनता के सवालों और रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित बताया।
यह उनके करियर का एक दिलचस्प चरण था, जिस पत्रकार ने डिजिटल दुनिया में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई, वही बाद में एक बड़े राष्ट्रीय समाचार नेटवर्क के प्राइम टाइम कार्यक्रम के जरिए मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचा।
पत्रकारिता में असली चुनौती क्या है?
शुभांकर मिश्रा की यात्रा को केवल ‘सफल पत्रकार की कहानी’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। इस यात्रा की वास्तविक सीख यह है कि पत्रकारिता में लोकप्रियता और विश्वसनीयता दो अलग चीजें हैं। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग किसी पत्रकार को देखते हैं, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए खबर की समझ, तथ्य, सवाल पूछने की क्षमता और दर्शकों के भरोसे की जरूरत होती है।
इसीलिए उनकी यात्रा को केवल फॉलोअर्स या टीवी स्क्रीन की सफलता से नहीं मापा जाना चाहिए।
उनकी कहानी को समझने का बेहतर तरीका यह है कि उन्होंने पत्रकारिता के बदलते माध्यमों के साथ खुद को बदला, टीवी से डिजिटल और डिजिटल से फिर बड़े टीवी मंच तक।
उपलब्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है बदलाव को स्वीकार करना
शुभांकर मिश्रा के करियर की सबसे प्रेरक बात शायद यही है कि उन्होंने एक ही पहचान से चिपके रहने के बजाय समय के साथ अपनी भूमिका बदली। पहले इंजीनियरिंग की दिशा से पत्रकारिता की ओर आए। फिर रिपोर्टिंग और एंकरिंग में अपनी जगह बनाई।
इसके बाद डिजिटल माध्यम में अपनी व्यक्तिगत पहचान विकसित की। फिर मुख्यधारा के प्राइम टाइम टीवी में वापसी की। यह क्रम बताता है कि करियर हमेशा सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। कभी-कभी रास्ता बदलना ही आगे बढ़ने का रास्ता बन जाता है।
युवाओं के लिए क्या सीख?
शुभांकर मिश्रा की कहानी को युवाओं के लिए प्रेरणा के रूप में इसलिए देखा जा सकता है क्योंकि इसमें एक महत्वपूर्ण संदेश छिपा है, करियर का पहला फैसला अंतिम फैसला नहीं होता। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी वास्तविक क्षमता किसी दूसरे क्षेत्र में है, तो उसे अपने विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। लेकिन केवल सपना देखना पर्याप्त नहीं है। नए रास्ते पर सफल होने के लिए मेहनत, सीखने की इच्छा और लगातार खुद को बेहतर बनाने की जरूरत होती है।
शुभांकर मिश्रा की यात्रा में भी यही क्रम दिखाई देता है, शिक्षा से मिले आधार को पीछे छोड़े बिना उन्होंने अपनी रुचि को पेशे में बदला और फिर उस पेशे में अपनी जगह बनाने के लिए वर्षों तक काम किया।
एक पत्रकार, जिसने माध्यम बदले लेकिन संवाद नहीं
शुभांकर मिश्रा की कहानी का सार किसी एक चैनल, किसी एक शो या सोशल मीडिया की लोकप्रियता में नहीं है। असल कहानी उस यात्रा की है जिसमें एक इंजीनियरिंग छात्र ने पत्रकारिता को चुना, एक पत्रकार ने टीवी की दुनिया में अपनी पहचान बनाई, उसी पत्रकार ने डिजिटल माध्यम की ताकत को समझा और फिर बड़े मंच पर लौटकर दर्शकों से संवाद जारी रखा।
मीडिया लगातार बदल रहा है। टीवी से डिजिटल, डिजिटल से शॉर्ट वीडियो और अब AI आधारित सूचना की दुनिया तक पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है।
ऐसे समय में शुभांकर मिश्रा की पेशेवर यात्रा एक बात जरूर सिखाती है।
माध्यम बदल सकते हैं, प्लेटफॉर्म बदल सकते हैं, लेकिन अगर सीखने की इच्छा और अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता बनी रहे तो करियर की दिशा बदली जा सकती है।
और शायद यही किसी भी सफल करियर की सबसे बड़ी पहचान है, मंजिल तक पहुंचने से ज्यादा जरूरी है, बदलते रास्तों के बीच खुद को लगातार आगे बढ़ाते रहना।

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