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वाराणसी के निजी अस्पताल में बच्ची की मौत पर हंगामा, इलाज में लापरवाही का आरोप
वाराणसी। चितईपुर थाना क्षेत्र के नेवादा स्थित एक निजी अस्पताल में करीब 21 माह की बच्ची की मौत के बाद मंगलवार को जमकर हंगामा हुआ। बच्ची के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए सड़क पर प्रदर्शन किया और कुछ समय के लिए आवागमन बाधित कर दिया। सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया।
परिजनों का आरोप है कि बच्ची को शुरुआत में बुखार की शिकायत के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उसकी स्थिति बिगड़ती गई और बाद में चिकित्सकों ने फेफड़ों में समस्या बताते हुए चेस्ट में ट्यूब डालने तथा ऑपरेशन किए जाने की बात कही। परिजनों का दावा है कि ऑपरेशन के बाद बच्ची की हालत लगातार खराब होती गई और वरिष्ठ चिकित्सक नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहे।
बुखार से शुरू हुआ इलाज, ऑपरेशन तक पहुंचा मामला
परिजनों के अनुसार बच्ची को 9 अगस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुरुआत में उसे बुखार था। परिवार का दावा है कि उपचार के दौरान बच्ची को निमोनिया की समस्या बताई गई और बाद में कहा गया कि दूध फेफड़ों में चला गया है। इसके बाद चेस्ट से संबंधित प्रक्रिया और ऑपरेशन किया गया। परिजनों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद बच्ची की हालत में सुधार होने के बजाय वह और गंभीर होती चली गई। उसका पेट फूलने लगा और बार-बार चिकित्सकों को बुलाने के बावजूद उन्हें संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई।
परिवार के एक सदस्य ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के बाद वरिष्ठ डॉक्टर कई दिनों तक अस्पताल में मौजूद नहीं थे और मरीज की निगरानी जूनियर स्टाफ तथा नर्सों के भरोसे चल रही थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
डॉक्टरों की गैरमौजूदगी का भी आरोप
बच्ची के मामा आशीष यादव ने आरोप लगाया कि इलाज करने वाले डॉक्टर कई दिनों तक अस्पताल में नहीं आए और मरीजों को वीडियो कॉल के माध्यम से देखने की बात कही गई। उनका दावा है कि अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों को लेकर भी इसी तरह की परेशानी थी। परिजनों का सवाल है कि यदि अस्पताल में आवश्यक विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं थे तो इतनी गंभीर स्थिति में बच्ची का ऑपरेशन क्यों किया गया।
हालांकि अस्पताल प्रबंधन की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए इलाज में वास्तविक लापरवाही हुई या नहीं, इसका निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।
शव को लेकर विवाद, परिजनों और अस्पताल के बीच बढ़ा तनाव
परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि बच्ची की मौत के बाद शव उन्हें तत्काल नहीं दिया गया और अस्पताल की ओर से कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया। परिवार का दावा है कि उनसे ऐसा लिखित देने को कहा गया कि वे अस्पताल के खिलाफ मुकदमा नहीं करेंगे। परिजनों के इन आरोपों के बाद विवाद और बढ़ गया। उन्होंने अस्पताल के बाहर प्रदर्शन किया और सड़क पर आवागमन रोक दिया।
अस्पताल कर्मी पर अभद्रता और मारपीट का आरोप

हंगामे के दौरान परिजनों ने अस्पताल की एक महिला कर्मचारी पर उनके साथ अभद्र व्यवहार और मारपीट का आरोप लगाया। परिवार का आरोप है कि विरोध करने पर महिला कर्मचारी ने चप्पल से मारने की कोशिश की और कुछ लोगों के साथ धक्का-मुक्की भी हुई।
परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस पूरे घटनाक्रम की भी जांच की जाएगी।
लाखों रुपये खर्च करने का दावा
परिवार ने इलाज में बड़ी रकम खर्च होने का भी दावा किया। उनका आरोप है कि आर्थिक परेशानी के बावजूद अस्पताल की ओर से दवाइयों और इलाज को लेकर लगातार पैसे की मांग की जाती रही।
एक परिजन ने दावा किया कि परिवार ने अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार इलाज पर बड़ी रकम खर्च की, लेकिन बच्ची को बचाया नहीं जा सका।
हालांकि अस्पताल की ओर से इलाज का कुल खर्च, दवाइयों की उपलब्धता और भुगतान को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सामने आएगी मौत की वजह

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने परिजनों की शिकायत दर्ज करने और बच्ची का पोस्टमार्टम कराने की प्रक्रिया शुरू की।
पुलिस अधिकारी के मुताबिक बच्ची को 9 अगस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और इलाज के दौरान उसकी मौत हुई। परिजनों ने अस्पताल पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए लिखित शिकायत दी है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत के चिकित्सकीय कारणों का पता चलेगा। इसके अलावा इलाज से जुड़े दस्तावेजों और परिजनों द्वारा लगाए गए अन्य आरोपों की भी जांच की जाएगी।
अधिकारी ने यह भी कहा कि फिलहाल किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं की गई है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
सवाल कई, जवाब जांच के बाद
इस घटना ने निजी अस्पतालों में इलाज की पारदर्शिता, वरिष्ठ चिकित्सकों की उपलब्धता, मरीजों के परिजनों से संवाद और इलाज के दौरान जवाबदेही जैसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन बच्ची की मौत को सीधे तौर पर चिकित्सकीय लापरवाही का परिणाम मान लेना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। परिजनों के आरोप गंभीर हैं और उनका सच सामने लाने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार की पूरी प्रक्रिया और अस्पताल की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
एक मासूम की मौत के बाद उठे सवालों का जवाब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच से मिलना चाहिए। अगर लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए और अगर आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।

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