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जोजरी नदी के केमिकल ने छीनी वन्यजीवों की जिंदगी, ग्रामीणों को मिला चर्म रोग और ‘जेल’ जैसा जीवन

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बाड़मेर। एक तरफ जहां राजस्थान के पचपदरा में रिफाइनरी और बड़े उद्योगों के जरिए विकास की नई इबारत लिखने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं इसके ठीक समानांतर धरातल पर तबाही की एक ऐसी मूक दास्तान भी लिखी जा रही है, जो इंसानी क्रूरता और प्रशासनिक उदासीनता की पराकाष्ठा है। जिला बालोतरा का डोली गांव आज विकास की इसी दोहरी नीति का दंश झेल रहा है। कभी नीलगायों, हिरणों, रोहिड़ा के पेड़ों और समृद्ध खेती से लहलहाने वाला यह क्षेत्र आज जोजरी नदी में बहाए जा रहे फैक्ट्रियों के जहरीले और केमिकल युक्त पानी के कारण एक अभिशप्त ‘टापू’ और ‘जेल’ में तब्दील हो चुका है।

बच्चों की पढ़ाई ठप, ग्रामीणों का पलायन

बारिश के मौसम में इस केमिकल युक्त खारे पानी का बहाव जब गांव की तरफ होता है, तो पूरा डोली गांव बाहरी दुनिया से कट जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि साल के चार महीने उनके लिए किसी ‘जेल’ जैसे होते हैं।
रास्ते पूरी तरह बंद हो जाने के कारण छोटे बच्चों को चार महीने के लिए स्कूल से छुट्टी करनी पड़ती है, जिससे उनका भविष्य अंधकार में डूब रहा है। संपन्न परिवार तो इस नारकीय स्थिति से तंग आकर यहां से पलायन कर चुके हैं, लेकिन गरीब और बेसहारा ग्रामीण इसी जहरीले माहौल में रहने को मजबूर हैं।

गहने पड़ रहे काले, फैल रहा चर्म रोग और कैंसर का खतरा

केमिकल की मार सिर्फ रास्तों तक सीमित नहीं है। गांव की महिलाओं ने बताया कि हवा और पानी में फैले प्रदूषण का असर इतना खतरनाक है कि उनके द्वारा पहने गए चांदी के आभूषण तक काले पड़ रहे हैं।
जहरीले पानी के संपर्क में आने से बच्चों और बुजुर्गों के हाथों-पैरों पर चर्म रोग साफ देखे जा सकते हैं। ग्रामीणों के मन में अब सबसे बड़ा डर यह है कि यह प्रदूषण धीरे-धीरे गांव में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को न्योता दे रहा है।

वन्यजीवों की कब्रगाह बना क्षेत्र, बबूल और सूअरों का साम्राज्य

डोली गांव के सरपंच ने खुद बेबसी जाहिर करते हुए बताया, पंचायत के पास इस केमिकल युक्त पानी को रोकने का कोई पावर या बजट नहीं है। कुछ समय पहले अदालत और प्रशासन की टीमें फाइलों में कार्रवाई करके गईं, लेकिन धरातल पर नतीजा शून्य है। पहले यहां हिरणों की बेहतरीन वाइल्डलाइफ थी, आज वे सब मर चुके हैं या पलायन कर गए। अब यहां सिर्फ बबूल की झाड़ियां, सूअर और मच्छरों का आतंक बचा है।
रात के समय बिजली कटौती और मच्छरों का प्रकोप इस कदर बढ़ जाता है कि मासूम बच्चों का जीना दूभर हो जाता है।
₹3000 में पानी खरीदने को मजबूर, घरों में आ रही दरारें
यह किसी विडंबना से कम नहीं है कि नदी के किनारे बसे होने के बावजूद ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए ₹2000 से ₹3000 देकर पानी के टैंकर मंगवाने पड़ रहे हैं। गांव के पारंपरिक ‘टांकों’ में भी जमीन के रास्ते यह केमिकल वाला पानी रिस कर मिल चुका है। केमिकल युक्त पानी जब लगातार घरों की दीवारों से टकराता है, तो मकानों में गहरी दरारें पड़ रही हैं, जिससे कई घर गिरने की कगार पर हैं।

वीवीआईपी कल्चर पर करोड़ों की बर्बादी, धरातल पर ‘पैसे नहीं हैं’ का रोना

ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के वीवीआईपी दौरों और टेंट-पंडालों पर होने वाले करोड़ों के खर्च पर तीखा आक्रोश जताया। ग्रामीणों का कहना है कि पचपदरा में सिर्फ टेंट लगाने और आयोजनों में करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, लेकिन जब एसडीएम या सरपंच से ₹20-25 लाख की लागत से गांव का रास्ता ठीक करने या पानी की निकासी की मांग की जाती है, तो बजट न होने का रोना रोया जाता है।

ग्रामीणों का सीधा आरोप: नेताओं की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। जो सरकारें खुद को गरीबों और युवाओं की हितैषी बताती हैं, वे सोशल मीडिया पर तो अपनी उपलब्धियां गिना रही हैं, लेकिन धरातल पर आकर हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

डोली गांव की यह बदहाली यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कैसा विकास है जो पर्यावरण, बेजुबान जानवरों और मासूम बच्चों के भविष्य की बलि देकर हासिल किया जा रहा है? जरूरत इस बात की है कि प्रशासन कागजी ढकोसलेबाजी बंद कर जोजरी नदी को प्रदूषित करने वाली फैक्ट्रियों पर कड़ा एक्शन ले और इस गांव को बुनियादी सुविधाएं देकर दोबारा जीवनदान दे।

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