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देश की राजधानी में फिर गूंजी महिलाओं की चीखें: घर, सड़क और स्कूल… आखिर कहाँ सुरक्षित हैं बेटियाँ?

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नई दिल्ली। नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे! और जवाब दो, जवाब दो! के नारों से एक बार फिर देश की राजधानी दिल्ली गूंज उठी है। जंतर-मंतर और दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं और जन-संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है। यह आक्रोश किसी एक घटना के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम के खिलाफ है जो आधी आबादी को सुरक्षा देने में नाकाम साबित हो रहा है। चलती बसों में बदसलूकी से लेकर स्कूल के भीतर मासूमों के साथ होने वाली दरिंदगी ने एक बार फिर देश को झकझोर कर रख दिया है।

स्कूल के भीतर 3 साल की बच्ची से दरिंदगी

हाल ही में दिल्ली के एक स्कूल के भीतर 3 साल की मासूम बच्ची के
साथ अधेड़ उम्र के व्यक्ति द्वारा यौन शोषण का मामला सामने आया है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस कृत्य में स्कूल की ही एक महिला शिक्षिका की संलिप्तता की बात सामने आ रही है।
प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है, हम इस उम्मीद में अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि वह सबसे सुरक्षित जगह है। लेकिन जब स्कूल के भीतर ही बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, तो हम उन्हें कहाँ भेजें? इस खौफ के कारण बेटियों की पढ़ाई-लिखाई छूटने की नौबत आ गई है।

अपराध करो और बेल पाओ, न्यायिक टिप्पणियों पर गहराया आक्रोश

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का सबसे बड़ा गुस्सा इस बात पर है कि जघन्य मामलों में भी आरोपियों को गिरफ्तारी के तुरंत बाद ज़मानत मिल जाती है। इसके साथ ही, हाल के दिनों में अदालतों और न्यायाधीशों की तरफ से आई कुछ तकनीकी और संवेदनशील टिप्पणियों पर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है।

प्रदर्शनकारियों का दर्द

न्यायाधीश को भगवान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन जब अदालतें मानसिक पीड़ा और छोटी बच्चियों पर पड़ने वाले डिप्रेशन को नजरअंदाज कर केवल शारीरिक मानदंडों के आधार पर बलात्कार की श्रेणी तय करने की बातें करती हैं, तो यह बेहद निंदाजनक है। क्या किसी मासूम की मानसिक बर्बादी की कोई कीमत नहीं है?
कई महिलाओं ने गुस्से में यहाँ तक कह दिया कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया की लंबी लेटलतीफी के बजाय ‘ऑन द स्पॉट’ सख्त से सख्त सजा या एनकाउंटर जैसा कानून होना चाहिए, ताकि अपराधियों के मन में खौफ पैदा हो।

राजनीतिक संरक्षण और चुनिंदा चुप्पी पर उठे सवाल

नेताओं और राजनीतिक दलों के रवैये को लेकर भी जनता में भारी नाराजगी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जब भी कोई रसूखदार, अमीर या सत्ता पक्ष से जुड़ा व्यक्ति ऐसे मामलों में संलिप्त होता है, तो पूरा सिस्टम उसे बचाने में जुट जाता है।
उन्नाव से लेकर मणिपुर की घटनाओं और महिला पहलवानों के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाया गया, लेकिन नेताओं के लिए समस्या घटना नहीं बल्कि वीडियो का ‘पब्लिक डोमेन’ में आना बन गया।
महिला अधिकारों के लिए मुखर रहने वाली कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय हर पार्टी ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘बेटी बचाओ’ का नारा देती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब चुप्पी साध लेते हैं। यहाँ तक कि वर्ष 2023 में महिला आरक्षण की बात तो की गई, लेकिन उसे ज़मीन पर लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति गायब दिखी।

पितृसत्तात्मक मानसिकता, समस्या की असली जड़

चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जड़ समाज की ‘पितृसत्तात्मक मानसिकता’ में है। जब तक घरों में लड़के और लड़की के बीच फर्क करना बंद नहीं किया जाएगा, तब तक बदलाव नामुमकिन है। लड़कों को बचपन से ही महिलाओं का सम्मान करना सिखाना होगा, न कि उन्हें विशेषाधिकार की भावना के साथ बड़ा करना होगा।

NCRB के आंकड़े, रक्षक ही भक्षक?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इस डरावनी हकीकत की पुष्टि करते हैं कि महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित अपने ही घरों में हैं। अधिकांश मामलों में यौन उत्पीड़न करने वाले कोई बाहरी अपराधी नहीं, बल्कि उनके पति, रिश्तेदार या कोई परिचित ही होते हैं।

आखिर लड़कियां जाएं तो कहाँ जाएं?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सुरक्षित न बना पाना, महिला प्रवासी मजदूरों के लिए मुफ्त बस यात्रा जैसी बुनियादी सुविधाएं न होना और कानून का लचर होना इस बात का सबूत है कि यह सिस्टम पुरुषों के हिसाब से काम कर रहा है।
आक्रोशित महिलाओं का अंतिम और सबसे चुभता हुआ सवाल यही था, अपराधी और दरिंदे खुलेआम सड़कों पर घूमते हैं, लेकिन कैद लड़कियों को कर दिया जाता है कि रात में बाहर मत निकलो। घर में सुरक्षित नहीं, बाहर सड़क पर सुरक्षित नहीं, ऑफिस और स्कूल में सुरक्षित नहीं… तो क्या इस देश की बेटियां अब जीना ही छोड़ दें?

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