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सरकारी फाइलों में ‘विकास’, जमीन पर ‘जर्जर’: ग्रेटर नोएडा की लोहिया सोसाइटी में बदहाली के बीच रहने को मजबूर 250 परिवार
ग्रेटर नोएडा। एक तरफ जहां चमचमाती गगनचुंबी इमारतें और आधुनिक सोसाइटियां ग्रेटर नोएडा की पहचान बन चुकी हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी उपेक्षा और प्रशासनिक सुस्ती का एक जीता-जागता उदाहरण इसी क्षेत्र के ओमिक्रॉन फर्स्ट ए में देखने को मिल रहा है। यहां स्थित सरकारी ‘लोहिया सोसाइटी’ अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। वर्ष 2014-15 में बनकर तैयार हुई इस विशालकाय सोसाइटी में आज भी लोग डर और असुविधा के साए में जीने को मजबूर हैं।
हाल ही में ग्राउंड जीरो से सामने आई स्थिति यह बयां करती है कि निजी सोसाइटियों को टक्कर देने के उद्देश्य से बनाई गई यह सरकारी योजना अब एक वीरान और जर्जर परिसर में तब्दील होती जा रही है।
विशाल परिसर, लेकिन केवल 250 परिवार
हैरानी की बात यह है कि सैकड़ों फ्लैट्स वाली इस विशालकाय सोसाइटी में अब तक केवल 250 के करीब परिवार ही शिफ्ट हो पाए हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन द्वारा पजेशन देने की रफ्तार बेहद धीमी है। कई ब्लॉक ऐसे हैं जहां पूरी बिल्डिंग में केवल एक या दो परिवार ही रह रहे हैं। अधिकारियों की इस सुस्ती के कारण अधिकांश फ्लैट वर्षों से खाली पड़े हैं, जिसके चलते पूरी सोसाइटी किसी वीरान खंडहर जैसी नजर आने लगी है।
दीवारों में दरारें और ‘बाथरूम के दरवाजे’ का जुगाड़
सोसाइटी की गैलरी और सीढ़ियों की दीवारों में जगह-जगह गहरी दरारें आ चुकी हैं। स्थिति को संभालने के लिए बिल्डर्स और कांट्रैक्टर अब उन दरारों में सीमेंट भरकर ‘पैच वर्क’ करने में जुटे हैं। निर्माण की गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परिसर में सुरक्षा के लिए लगाए गए कांच टूटने पर, प्रशासन ने वहां कांच बदलने के बजाय ‘बाथरूम के दरवाजे’ ही फिट कर दिए।
जब वहां काम कर रहे कंस्ट्रक्शन सुपरवाइजर से इस कमी पर सवाल किया गया, तो उनका कहना था, इतने सालों से बिल्डिंग खाली पड़ी थी, जब रखरखाव नहीं होगा तो पैचेस तो आएंगे ही। अभी लोग धीरे-धीरे आ रहे हैं, तो अब सुधार का काम किया जा रहा है।
बीमारियों को न्योता देती गंदगी और बंजर पार्क
परिसर के भीतर साफ-सफाई की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। सीढ़ियों और कॉमन एरिया में मलबे के ढेर लगे हैं। जहां बच्चों के खेलने के लिए पार्क और हरे-भरे पेड़-पौधे होने चाहिए थे, वहां आज बड़ी-बड़ी घास और कंटीली झाड़ियां उग आई हैं, जिससे यह क्षेत्र एक बंजर जंगल जैसा प्रतीत होता है। स्थानीय निवासियों को डर है कि इन झाड़ियों में सांप-बिच्छू जैसे जहरीले जीव हो सकते हैं, जिससे उनके बच्चों की सुरक्षा खतरे में है।
सोसाइटी के एक निवासी ने गुस्से और बेबसी के साथ कहा, आप खुद देखिए कितनी गंदगी है। चारों तरफ मच्छर पनप रहे हैं, बच्चे बीमार पड़ रहे हैं। अगर यही कोई प्राइवेट सोसाइटी होती तो आज चमक रही होती। साफ-सफाई के मामले में सरकारी व्यवस्था बिल्कुल बेकार है।
जर्जर हो चुके पानी के पाइप, बेसमेंट का रास्ता बंद
वर्ष 2014 की बनी इस बिल्डिंग की पाइपलाइन अब गल चुकी है। जगह-जगह से पाइप लीक हो रहे हैं, जिसके कारण परिसर में पानी जमा हो रहा है। यह जमा पानी मच्छरों का ब्रीडिंग ग्राउंड बन चुका है। इसके अलावा, वाहनों की पार्किंग के लिए बने बेसमेंट की हालत तो और भी बदतर है; उसके एंट्री पॉइंट को टिन शेड लगाकर पूरी तरह बंद कर दिया गया है।
आरडब्ल्यूए की कमी और प्रशासनिक अनदेखी
स्थानीय लोगों के मुताबिक, फिलहाल 8 से 10 दिन में केवल एक बार सफाईकर्मी आते हैं। निवासियों ने अथॉरिटी को कई बार लिखित शिकायतें और पत्र भेजे हैं, जिसके बाद प्रशासन ने जल्द सुधार का आश्वासन तो दिया है, लेकिन जमीन पर रफ्तार कछुए जैसी है। कम आबादी होने के कारण अभी तक यहां रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन का गठन भी नहीं हो पाया है, जिससे निवासियों की आवाज संगठित रूप से अथॉरिटी तक नहीं पहुंच पा रही है।
आखिर कब तक गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवनभर की कमाई लगाने के बाद ऐसी जर्जर सरकारी व्यवस्थाओं के भरोसे घुट-घुट कर जीने को मजबूर रहेंगे? क्या ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी इस सुस्ती को छोड़कर कोई ठोस कदम उठाएगी, या यह सोसाइटी पूरी तरह खंडहर होने का इंतजार करेगी?

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