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70% से 21% आरक्षण पर विवाद, लखनऊ में मेडिकल छात्रों का प्रदर्शन
लखनऊ। ईको गार्डन में एससी-एसटी वर्ग के मेडिकल छात्रों ने चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू विशेष आरक्षण व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन किया। छात्रों का आरोप है कि अंबेडकर नगर, सहारनपुर, जालौन और कन्नौज के मेडिकल कॉलेजों में विशेष प्रावधान के तहत लंबे समय से करीब 70 प्रतिशत सीटें एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए निर्धारित थीं, जिन्हें अब सामान्य आरक्षण व्यवस्था के तहत करीब 21 प्रतिशत तक सीमित किया जा रहा है।
छात्रों का कहना है कि यह बदलाव बिना पर्याप्त सार्वजनिक स्पष्टीकरण के किया जा रहा है। वे चाहते हैं कि पहले से लागू व्यवस्था को जारी रखा जाए और इसे भविष्य में किसी प्रशासनिक आदेश के जरिए बदलने के बजाय स्पष्ट कानूनी प्रावधान के रूप में सुरक्षित किया जाए।
चार मेडिकल कॉलेजों को लेकर उठे सवाल
प्रदर्शनकारी छात्रों के मुताबिक इन चार मेडिकल कॉलेजों की स्थापना में स्पेशल कंपोनेंट प्लान के तहत मिलने वाली धनराशि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनका तर्क है कि जब इन संस्थानों की स्थापना ही वंचित वर्गों के शैक्षणिक उत्थान के उद्देश्य से की गई थी, तो बाद में उसी विशेष व्यवस्था को समाप्त करना उस मूल उद्देश्य को प्रभावित करेगा।
कन्नौज मेडिकल कॉलेज की छात्रा प्रेमलता ने कहा कि यदि विशेष व्यवस्था समाप्त कर दी गई तो इन कॉलेजों में एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अवसर कम हो जाएंगे। छात्रों का कहना है कि करीब 70 प्रतिशत से 21 प्रतिशत तक सीटों में बदलाव से हर वर्ष बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रभावित हो सकते हैं।
हमारी लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि उनका आंदोलन राजनीतिक दलों के बजाय मुख्य रूप से अपने शैक्षणिक अधिकार और संस्थानों की विशेष व्यवस्था को बचाने के लिए है। हालांकि, आंदोलन को विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का समर्थन मिलने का दावा किया गया है।
छात्रों के मुताबिक चंद्रशेखर आजाद, स्वामी प्रसाद मौर्य और समाजवादी पार्टी से जुड़े प्रतिनिधियों ने आंदोलन का समर्थन किया है। वहीं, कुछ छात्रों का कहना है कि उन्होंने भाजपा के नेताओं और मंत्रियों से भी संपर्क किया है और उन्हें मामले को देखने का आश्वासन मिला है।
छात्रों का कहना है कि राजनीतिक समर्थन तभी सार्थक होगा, जब उनकी मांग सरकार के स्तर पर सुनी जाए और नीति को लेकर स्पष्ट निर्णय सामने आए।
हमने एडमिशन लिया, तो नियम कुछ
मेडिकल छात्रा श्रेया ने कहा कि उन्होंने जिस व्यवस्था के तहत प्रवेश लिया, उसमें एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए विशेष अवसर मौजूद थे। उनका सवाल है कि यदि आगे आने वाले विद्यार्थियों के लिए वही व्यवस्था समाप्त कर दी जाती है तो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर कैसे मिलेगा।
छात्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलने के बाद पढ़ाई और परीक्षा के मानक अलग नहीं हो जाते। उनके मुताबिक एमबीबीएस की पढ़ाई में उन्हें भी निर्धारित शैक्षणिक मानकों और परीक्षाओं को पूरा करना होता है।
जातिगत भेदभाव खत्म होने के दावे पर सवाल
प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने उस तर्क पर भी सवाल उठाया कि देश में जातिगत भेदभाव अब समाप्त हो चुका है। उनका कहना है कि जब तक सामाजिक और शैक्षणिक असमानताएं पूरी तरह खत्म नहीं होतीं, तब तक सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों की जरूरत बनी रहेगी। छात्रों का तर्क है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए ईडब्ल्यूएस जैसी व्यवस्था मौजूद है, लेकिन जातिगत और सामाजिक वंचना अलग प्रकार की समस्या है। इसलिए दोनों को एक ही पैमाने से नहीं देखा जाना चाहिए।
हालांकि, आरक्षण की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था और राज्य सरकार द्वारा इन चार मेडिकल कॉलेजों में विशेष प्रावधान को लेकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित सरकारी आदेश और आधिकारिक दस्तावेज देखना जरूरी होगा।
कोर्ट से विधानसभा तक लड़ाई ले जाने की तैयारी
प्रदर्शनकारियों के अनुसार वे पिछले करीब एक महीने से अलग-अलग माध्यमों से अपनी मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ अब वे सरकार और विधानसभा के स्तर पर भी अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे हैं। छात्र चाहते हैं कि विशेष आरक्षण नीति को स्थायी कानूनी आधार दिया जाए, ताकि भविष्य में सरकार या प्रशासनिक स्तर पर इसे अचानक बदला न जा सके।
सरकार के सामने अब बड़ा सवाल
लखनऊ का यह प्रदर्शन केवल चार मेडिकल कॉलेजों में सीटों के प्रतिशत का विवाद नहीं है। इसके पीछे यह बड़ा सवाल है कि विशेष सामाजिक समूहों के शैक्षणिक उत्थान के लिए बनाई गई नीतियों को बदलने का आधार क्या होना चाहिए और ऐसे बदलाव से पहले प्रभावित विद्यार्थियों से कितना संवाद किया जाना चाहिए।
छात्रों की मांग साफ है, चारों मेडिकल कॉलेजों में पहले से चली आ रही विशेष व्यवस्था को खत्म न किया जाए और 70 प्रतिशत से 21 प्रतिशत तक प्रस्तावित कमी पर सरकार सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष स्पष्ट करे। अब देखना होगा कि सरकार छात्रों की मांग पर क्या निर्णय लेती है और क्या इस विवाद का समाधान बातचीत और स्पष्ट नीति के जरिए निकलता है।

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