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290 घरों पर बुलडोजर का खतरा, गंगा किनारे बसे परिवारों में दहशत
पटना। बिहार सरकार की ओर से पटना के नौजर घाट से कंगन घाट के बीच करीब 290 घरों को हटाने की कार्रवाई के आदेश के बाद गंगा किनारे रहने वाले परिवारों में दहशत का माहौल है। रहवासियों का कहना है कि उन्हें हर वक्त बुलडोजर आने का डर सता रहा है। कई परिवारों का दावा है कि वे 25 से 50 वर्षों से यहां रह रहे हैं और उनके पास अपने मकानों से जुड़े दस्तावेज भी हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक कार्रवाई की सूचना के बाद कई परिवार कामकाज छोड़कर घरों की निगरानी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि मकान टूटे तो उनके पास रहने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।
हमारे पास लड़ने के लिए कुछ नहीं
स्थानीय निवासी बताते हैं कि प्रशासन की कार्रवाई के डर से लोग न ठीक से काम कर पा रहे हैं और न चैन से सो पा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार के पास पूरी व्यवस्था और ताकत है, जबकि गरीब परिवारों के पास सीमित संसाधन हैं। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने अपने दावों के समर्थन में अदालत में दस्तावेज भी पेश किए हैं।
रहवासियों का आरोप है कि कई मकान 10, 20, 25 और उससे भी अधिक वर्षों पुराने हैं। उनका दावा है कि इलाके में हाल के दिनों में नए निर्माण नहीं किए गए हैं। ऐसे में सभी मकानों को एक ही श्रेणी में रखकर कार्रवाई किए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अलग-अलग व्याख्या का दावा

स्थानीय लोगों और उनके पक्ष में बोल रहे अधिवक्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश गंगा की जलधारा और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाले अवैध निर्माणों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इस आदेश की आड़ में रैयती जमीन पर बने घरों को भी हटाने की कार्रवाई की जा रही है। उनका कहना है कि पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जमीन सरकारी है या निजी। रहवासियों का दावा है कि उन्होंने जमीन से जुड़े दस्तावेज प्रशासन और अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए हैं और इस मामले में हाई कोर्ट में भी कानूनी प्रक्रिया चल रही है।
पुनर्वास को लेकर सवाल

सबसे बड़ा सवाल उन परिवारों के पुनर्वास को लेकर है, जिनके मकान कार्रवाई की जद में आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें कोई स्पष्ट वैकल्पिक आवास या जमीन नहीं बताई गई है। कई परिवारों में बच्चों की पढ़ाई चल रही है और महिलाओं तथा बुजुर्गों के लिए भी घर छोड़ना मुश्किल है। कुछ लोगों ने कहा कि यदि मकान तोड़े गए तो वे मजबूरी में उसी जगह तिरपाल लगाकर रहने को मजबूर होंगे। उनका कहना है कि किराए का मकान लेने की आर्थिक क्षमता उनके पास नहीं है।
बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होने की चिंता
स्थानीय परिवारों का कहना है कि घर टूटने की स्थिति में बच्चों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। कई बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं और परिवार पहले ही आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। अभिभावकों का सवाल है कि यदि घर ही नहीं रहेगा तो बच्चों की पढ़ाई कैसे जारी रखी जाएगी। रहवासियों ने सरकार से कार्रवाई पर पुनर्विचार करने और पहले उनकी जमीन के दस्तावेजों की जांच करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि कोई निर्माण वास्तव में अवैध है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, लेकिन दशकों से रह रहे परिवारों को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर न किया जाए। फिलहाल, प्रभावित परिवारों की नजर प्रशासन और अदालत की अगली कार्रवाई पर है। लोगों का कहना है कि जब तक उनके मामले का अंतिम समाधान नहीं होता, तब तक मकान तोड़ने की कार्रवाई पर रोक लगाई जानी चाहिए।

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