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‘नरक’ में तब्दील हुआ ग्रेटर नोएडा का कांशीराम आवास: वादों के ‘भयमुक्त’ प्रदेश में सांपों के साये और गंदगी में जीने को मजबूर 500 से अधिक परिवार
ग्रेटर नोएडा। एक तरफ जहां उत्तर प्रदेश को ‘स्वच्छ प्रदेश’ और ‘भयमुक्त प्रदेश’ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं देश की सबसे आधुनिक मानी जाने वाली औद्योगिक नगरी ‘ग्रेटर नोएडा’ के आंचल में एक ऐसा काला धब्बा है, जिसे देखकर व्यवस्था शर्मसार हो जाए। घोड़ी बछेड़ा गांव स्थित कांशीराम आवास योजना के फ्लैट्स आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। यहां रहने वाले करीब 504 परिवार किसी वीराने या जंगल में नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के ‘सरताज’ कहे जाने वाले ग्रेटर नोएडा में नरकीय जीवन जीने को विवश हैं।

‘सेंट्रल पार्क’ बना दलदल, बच्चों के सिर पर मंडराता मौत का साया
ग्राउंड रियलिटी चेक के दौरान इस कॉलोनी का तथाकथित ‘सेंट्रल पार्क’ झाड़ियों और गंदे पानी का एक खौफनाक जाल नजर आया। स्थानीय निवासी ललिता गौतम और अन्य महिलाओं ने रोष जताते हुए कहा, योगी जी और मोदी जी कहते हैं कि हम देश का विकास कर रहे हैं, लेकिन हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है। पार्क में दो-दो, तीन-तीन फीट ऊंची झाड़ियां हैं जहां जहरीले नाग और बिच्छू घूमते हैं। हमारे बच्चे इसी गंदगी में रहने और सांस लेने को मजबूर हैं।
एक दिव्यांग युवती जो इसी माहौल में मजबूरीवश करीब 80 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है, उसने बताया कि यहां खुले में बच्चों को बैठाना पड़ता है क्योंकि घरों और बाहर की स्थिति बेहद जर्जर है। आए दिन यहां जहरीले सांप निकलते हैं और बच्चों की जान बाल-बाल बचती है।
चुनावी वादे हवा-हवाई, एक ‘स्ट्रीट लाइट’ को तरसी कॉलोनी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े नेता वोट मांगने आते हैं, लेकिन जीतने के बाद पलटकर नहीं देखते। स्थानीय महिला ने बताया, सांसद महेश शर्मा जी जब यहां आए थे, तो हमने उनका स्वागत किया था और सिर्फ एक स्ट्रीट लाइट की मांग की थी ताकि रात के अंधेरे में बच्चों को सांप-कीड़े न काटें। लेकिन आज तक एक लाइट भी नसीब नहीं हुई।
बदबूदार सीवर का उफनता पानी, जाम नालियां और चारों तरफ पनपते मच्छरों के लारवे ने इस पूरी कॉलोनी को एक टाइम बम बना दिया है, जो कभी भी किसी बड़ी महामारी का रूप ले सकता है। चार मंजिला इमारतों के लैट्रिन और सीवर का मलबा खुले में बह रहा है, जिससे सांस लेना भी दूभर हो चुका है।

मायावती सरकार के बाद थम गया विकास, जर्जर हुईं इमारतें
साल 2010 में मायावती सरकार के कार्यकाल के दौरान इन फ्लैटों का आवंटन गरीबों के लिए किया गया था। निवासियों का कहना है कि बसपा सरकार के समय यहां नियमित सफाई और हर तीन साल में पुताई-रखरखाव होता था। लेकिन जब से मौजूदा सरकार आई है, विकास कार्य पूरी तरह ठप है। इमारतों के छज्जे टूट कर गिर रहे हैं, ग्रिल में जंग लग चुकी है और पूरी बिल्डिंगों के कभी भी जमींदोज होने का खतरा बना हुआ है। निवासियों ने तीखे लहजे में कहा, क्या सरकार तब जागेगी जब दो-चार बिल्डिंगें गिर जाएंगी और गरीब मर जाएंगे?
निजी डॉक्टरों की मनमानी के आगे बेबस गरीब
इस वीरान बस्ती में बुनियादी सुविधाओं का अकाल है। कॉलोनी के भीतर न तो कोई सरकारी स्कूल है और न ही कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ।
शिक्षा की मार: पैसे न होने के कारण गरीब अपने बच्चों को दूर के स्कूलों में नहीं भेज पा रहे हैं, जिससे बच्चों का भविष्य अंधकार में है।
स्वास्थ्य की लाचारी: कोई आपातकालीन स्थिति या डिलीवरी का मामला होने पर लोगों को 12 से 13 किलोमीटर दूर दादरी या घोड़ी गांव भागना पड़ता है। रात के समय स्थिति और भी भयावह हो जाती है। निजी अस्पताल और डॉक्टर गरीबों से 3,000 से 4,000 रुपये की मनमानी वसूली करते हैं, जिसे चुकाने के लिए घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली इन महिलाओं को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है।
मोदी जी का नारा है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। लेकिन हम अपनी बेटियों को इस गंदगी में कैसे पढ़ाएं? नेता लोग सिर्फ लेक्चर देना जानते हैं, कभी हमारी झुग्गी और फ्लैट में आकर देखें कि हम कैसे जी रहे हैं। जिनके पास नोट हैं, उनके बच्चे पढ़ रहे हैं, हमारे बच्चे तो तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं।

प्रशासन की चुप्पी और मीडिया की बेरुखी
ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी और स्थानीय प्रशासन इस कांशीराम आवास की सुध लेने को तैयार नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, आज तक कोई बड़ा अधिकारी या मुख्यधारा का मीडिया कर्मी उनकी आवाज उठाने यहां नहीं पहुंचा। इस बदहाली के बीच लोग सिर्फ एक ही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि प्रशासन की नींद टूटेगी, इस कॉलोनी का कायाकल्प होगा और उनके बच्चों को भी एक सुरक्षित बचपन मिल सकेगा।
अब देखना यह है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली सरकार इस ‘नरक’ बन चुकी कांशीराम सोसाइटी के नागरिकों को उनका बुनियादी अधिकार कब तक दिला पाती है।
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