देश
डीएलएफ फेज-1 में नगर निगम का ‘पीला पंजा’: बिना नोटिस तोड़ी दुकानें, लाखों का सामान मलबे में तब्दील
गुरुग्राम | डीएलएफ फेज-1 इलाके में मंगलवार को नगर निगम की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के ‘बुलडोजर’ चलाकर दर्जनों छोटी दुकानों और ठेलों को जमींदोज कर दिया। इस कार्रवाई में न केवल गरीबों की रोजी-रोटी छिनी, बल्कि लाखों रुपये का कीमती सामान और फल-सब्जियां मलबे में दबकर बर्बाद हो गईं।
‘अमीरों की पार्किंग पर चुप्पी, गरीबों की दुकान पर प्रहार’
कार्रवाई के दौरान स्थानीय लोगों और दुकानदारों में भारी आक्रोश देखा गया। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पीड़ित दुकानदारों ने प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए। सब्जी विक्रेता और मोची का काम करने वाले बुजुर्गों का कहना था कि जहां एक तरफ सड़क के दोनों किनारों पर रईसों की बड़ी-बड़ी गाड़ियां अवैध पार्किंग के रूप में खड़ी रहती हैं, जिससे ट्रैफिक जाम होता है, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। वहीं, पेड़ की छांव में बैठकर 200-300 रुपये कमाने वाले गरीबों की गुमटियों को बिना समय दिए तोड़ दिया गया।
सरकारी योजनाओं को भी नहीं बख्शा

हैरानी की बात यह रही कि इस कार्रवाई की जद में केंद्र सरकार द्वारा प्रमोटेड मदर डेयरी (सफल) की आउटलेट भी आ गई। दुकान के ओनर ने बताया कि वे ‘भारत दाल’ और ‘भारत आटा’ जैसी सरकारी योजनाओं के तहत जनता को ₹5 किलो आलू जैसी रियायती दरों पर सामान बेच रहे थे। दुकानदारों का आरोप है कि अमित शाह जी द्वारा प्रमोटेड और ऑर्गेनिक उत्पादों को बढ़ावा देने वाली इन दुकानों को भी बिना किसी मोहलत के ढहा दिया गया, जिससे लाखों का नुकसान हुआ।
बिना नोटिस ‘सरप्राइज’ कार्रवाई
पीड़ित दुकानदार संजय कुमार और नगेंद्र चौहान ने बताया, “हमें कोई नोटिस नहीं दिया गया। अगर प्रशासन हमें सिर्फ एक घंटे का समय दे देता, तो हम अपना कीमती सामान, फ्रिज और इन्वेंट्री हटा लेते। नगर निगम की टीम अचानक आई और सब कुछ तहस-नहस कर दिया।” कई दुकानदारों का कहना है कि उनकी दुकानें बाउंड्री वॉल के अंदर थीं, फिर भी उन्हें अतिक्रमण मानकर तोड़ दिया गया।
लाखों का नुकसान, कौन होगा जिम्मेदार?

कार्रवाई के बाद मलबे के बीच बिखरी सब्जियां, टूटे हुए फ्रिज और बिखरा हुआ राशन प्रशासन की संवेदनहीनता की कहानी बयां कर रहा है। दुकानदारों का कहना है कि चुनाव के समय वोट मांगने के लिए पार्षद और नेता बार-बार आते हैं, लेकिन जब उनके रोजगार पर संकट आया, तो किसी ने भी उन्हें आगाह करना जरूरी नहीं समझा।
“यह अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि गरीबों के पेट पर लात मारना है। क्या प्रशासन को सड़क घेरे खड़ी बड़ी गाड़ियां नहीं दिखतीं? सारा कानून क्या सिर्फ ₹200 कमाने वालों के लिए है?अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन गरीबों को हुए नुकसान की भरपाई करेगा या फिर ‘अतिक्रमण’ के नाम पर ऐसी ही एकतरफा कार्रवाइयां जारी रहेंगी?
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