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चुनावी वादे बनाम जमीनी हकीकत: शालीमार बाग में फूटा जनता का आक्रोश
नई दिल्ली। जब माननीय रेखा गुप्ता जी हमारे पास आई थीं, तो उन्होंने कहा था कि हम आपका विकास करेंगे। हमें नहीं मालूम था कि विकास के नाम पर वो हमारा विनाश कर देंगी। यह दर्द और आक्रोश दिल्ली के शालीमार बाग गांव के एक स्थानीय निवासी का है, जो पिछले चार महीनों से अपने आशियाने को टूटने से बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
शालीमार बाग इलाके में इन दिनों एक बेहद अनोखा और दिल दहला देने वाला प्रदर्शन चल रहा है। यहां के पुरुष, महिलाएं और मासूम बच्चे अपने चेहरों पर गधे का मास्क लगाकर सड़कों पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि चुनाव के समय हाथ जोड़कर वोट मांगने वाली सरकार ने आज उन्हें ‘गधा’ समझ लिया है। ‘शालीमार गांव घर बचाओ आंदोलन’ के बैनर तले यहां के 150 मकानों और करीब 500 परिवारों के वजूद पर संकट मंडरा रहा है।
‘राइट टू वे’ या पूंजीपतियों को फायदा?
दिल्ली सरकार द्वारा सड़क चौड़ीकरण के तहत इस इलाके के मकानों को तोड़ने का नोटिस जारी किया गया है। लेकिन स्थानीय निवासियों और आंदोलन के आयोजक मुकेश कुमार पासवान का आरोप कुछ और ही है।
मुकेश कुमार ने बताया, यह पूरी तरह से मनमानी है। सरकार का ध्येय सिर्फ पूंजीपतियों को बसाना और गरीबों को उजाड़ना है। इस सड़क पर पहले से ही ‘डबल रोड’ है, जहां से बड़े-बड़े मिनी ट्रक और कारें आसानी से गुजर जाती हैं। जब कोई जाम ही नहीं लगता, तो इस सड़क को और चौड़ा करने की क्या जरूरत है?
प्रदर्शनकारियों ने सीधे तौर पर स्थानीय विधायिका व मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके पति मनीष गुप्ता पर गंभीर आरोप लगाए हैं। लोगों का कहना है,
पास के एक बड़े निजी अस्पताल (मैक्स हॉस्पिटल) के आगे की सड़क को 5 साल की लीज पर पार्किंग के लिए दे दिया गया है, लेकिन वहां से अतिक्रमण हटाने के बजाय परमानेंट आशियानों को निशाना बनाया जा रहा है।
सड़क के दूसरी तरफ फुटपाथ और नाले की 12 फीट जगह का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की तैयारी है।
मुख्यमंत्री निवास की सड़क भी इससे कम चौड़ी है, पहले उसे तुड़वाएं। ₹3 लाख का मुआवजा देकर हमारे बहुमंजिला मकान छीने जा रहे हैं। इतने पैसों में आज के समय में कौन सा घर बनता है?
60 साल का आशियाना और 10 जनवरी का वो ‘काला नोटिस’
इलाके में दशकों से रह रही शमशेरा बताती हैं कि वे लोग यहाँ पिछले 60 साल से रह रहे हैं। उनके पास वैध कागजात हैं और उन्होंने यह जमीन सीधे किसानों से खरीदी थी। लेकिन 10 जनवरी को आए एक नोटिस ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी है।
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि प्रशासन 1959 के भूमि अधिग्रहण का हवाला दे रहा है, लेकिन अगर जमीन तब अधिग्रहित की गई थी, तो इतने सालों तक कब्जा क्यों नहीं लिया गया? बीच में यह भी आदेश आया था कि इस क्षेत्र को अवॉर्ड से बाहर रखा जाएगा, फिर अचानक इसे तोड़ने की जद में क्यों लाया गया?

दफ्तर बन गया घर, धरने पर बैठे हैं नौनिहाल
सड़क किनारे अब एक दफ्तर नुमा कार्यालय खुल गया है, जिसे ‘घर बचाओ आंदोलन’ का मुख्यालय बनाया गया है। यहां दिन-रात महिलाएं और बच्चे धरने पर बैठे हैं। लोगों का कहना है कि पिछले चार-पांच महीनों से उनका कामकाज ठप है। डर के साए में जी रहे लोग अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्थानीय निवासियों के अनुसार, चुनाव जीतने और मुख्यमंत्री बनने के बाद से रेखा गुप्ता एक बार भी अपने इस क्षेत्र के वोटरों से मिलने नहीं आई हैं।
क्या जनता सिर्फ वोट बैंक है?
इस अनोखे ‘गधा मास्क’ प्रदर्शन ने दिल्ली प्रशासन के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विकास का मतलब सड़कों का चौड़ीकरण जरूर हो सकता है, लेकिन क्या इसकी कीमत सैकड़ों गरीब परिवारों को बेघर करके चुकाई जानी चाहिए? शालीमार बाग की जनता आज अपनी ही चुनी हुई जन प्रतिनिधि की राह देख रही है कि कोई आए और उनके आशियानों को उजड़ने से बचाए।

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