देश
‘चकाचक पटना’ के दावों के बीच नरक बनी मीठापुर की ये गली, एक साल से घुटने भर गंदे पानी में जीने को मजबूर लोग
पटना। चकाचक बनाने के नगर निगम और सरकार के दावों की जमीनी हकीकत देखनी हो, तो मीठापुर के बी-एरिया की गलियों का रुख कर लीजिए। यहाँ कागजों पर दौड़ रहा विकास असलियत में जलजमाव के गंदे नाले में गुम हो चुका है। पिछले ८ से ९ महीनों से यहाँ की मुख्य गली घुटने भर गंदे और बदबूदार पानी से सराबोर है, लेकिन नगर निगम से लेकर स्थानीय वार्ड कमिश्नर तक, कोई सुध लेने वाला नहीं है।
क्या हम सुपरमैन हैं जो कूद कर जाएं?
इस नारकीय स्थिति का सबसे बुरा असर यहाँ रहने वाले स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। कक्षा ७ की छात्रा ने रोष और लाचारी व्यक्त करते हुए बताया, एक साल से पानी लगा है। स्कूल जाने-आने में दो बार फिसल कर इस गंदे पानी में गिर चुकी हूँ। अब डर के मारे कई बार स्कूल नहीं जा पाती, रेगुलर एब्सेंट होना पड़ता है।
वहीं ५वीं कक्षा के छात्र आदित्य कुमार का गुस्सा भी सरकार की नीतियों पर फूटा। उसने तंज कसते हुए कहा, सरकार कहती है कि बच्चों को पढ़ाओ, पर यहाँ स्कूल जाने के लिए हमें टाइटेनिक जहाज खरीदना पड़ेगा! रास्ते में ईंटों पर पैर रखकर जाना पड़ता है, जिससे पैर छिल जाते हैं। क्या हम बंदर या सुपरमैन हैं जो कूद कर चले जाएं?
सड़ रहे हैं पैर, डेंगू और स्किन इंफेक्शन का बढ़ा खतरा
स्थानीय महिलाओं और युवाओं का कहना है कि ८ महीनों से लगातार अधिकारियों को कॉल कर के थक चुके हैं, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा। गंदे पानी में रोज आने-जाने के कारण लोगों को पैरों में गंभीर स्किन इंफेक्शन हो चुका है।
रात के समय स्थिति और बदतर हो जाती है। गंदे नाले के पानी में मरे हुए चूहे और कुत्ते सड़ रहे हैं, जिससे उठने वाली सड़ांध के कारण लोग अपनी छतों पर बैठ तक नहीं पाते। जमे हुए पानी के कारण इलाके में मच्छरों का भयंकर प्रकोप है, जिससे हर वक्त डेंगू, मलेरिया और वायरल फीवर का खतरा मंडरा रहा है।
लगता है जहर खाकर मर जाएं…
एक स्थानीय पीड़ित महिला ने रोते हुए अपना दर्द बयां किया, बारिश में तो छोड़िए, आम दिनों में भी नाले का नरक जैसा पानी हमारे घरों के भीतर घुस जाता है। २४ घंटे हम इसी गंदे पानी के बीच रहने को मजबूर हैं। जिंदगी नरक से भी बदतर हो गई है, कभी-कभी लगता है कि जहर खाकर मर जाएं।
अफसरशाही का एक ही रटंत जवाब ‘पुल बनेगा तब पानी सूखेगा’
जब भी जनता अपनी गुहार लेकर नगर निगम या वार्ड कमिश्नर के पास जाती है, तो उन्हें आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक पास में बन रहा पुल पूरा नहीं होता, तब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। सफाईकर्मी आते भी हैं, तो नाले का कचरा निकाल कर सड़क किनारे ही फेंक कर चले जाते हैं, जो दोबारा उसी पानी में बह जाता है।
करोड़ों का बजट, पर धरातल पर शून्य
एक तरफ सरकार देश को विश्वगुरु बनाने और २०४७ तक विकसित भारत का सपना दिखा रही है, वहीं सूबे की राजधानी के वीआईपी इलाकों के ठीक बगल में बसे मीठापुर की यह स्थिति दावों पर बड़े सवाल खड़े करती है। करोड़ों का सफाई बजट आखिर कहाँ जा रहा है, इसका जवाब न तो नगर निगम के पास है और न ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास। जनता का साफ कहना है, नेताओं के महल जैसे दफ्तरों और घरों में सब चकाचक है, पर आम जनता को नरक में मरने के लिए छोड़ दिया गया है।
-
देश11 months agoसत्ता, पैसा और अंधविश्वास – बाबा इंडस्ट्री की असली कहानी
-
देश11 months agoन्याय के लिए डंडा खाती मां! 🚨 ममता सरकार पर सवाल | Kolkata Case
-
Blog11 months agoBageshwar Baba Exposed? 😱 Miracle ✨ या Illusion 🎭
-
एजुकेशन11 months agoखमरिया गांव की शिक्षा पर संकट: ताले में बंद प्राथमिक शाला और मधुशाला बनी माध्यमिक शाला

You must be logged in to post a comment Login