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किसान परिवार से निकला ‘सिंघम IAS’,25 तबादले 21 साल की नौकरी और वही सख्त तेवर: तुकाराम मुंढे
मिलावटखोरों पर छापे हों या प्रशासनिक दबाव तुकाराम मुंढे की पहचान रही है बेबाक फैसलों और सख्त कार्यशैली की। 21 साल के करियर में करीब 25 तबादलों के बावजूद उनकी प्रशासनिक छवि पर सबसे ज्यादा चर्चा उनकी निडर कार्यशैली को लेकर होती रही है।
महाराष्ट्र की नौकरशाही में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं होती। तुकाराम मुंढे उन्हीं नामों में शामिल हैं। एक ऐसे आईएएस अधिकारी, जिनका नाम आते ही लोगों के जेहन में सख्त प्रशासन, नियमों का पालन और मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करने की तस्वीर उभरती है। यही वजह है कि आम लोगों के बीच उन्हें कई बार ‘सिंघम आईएएस’ के नाम से भी पुकारा जाता है।
हालांकि ‘सिंघम’ कोई आधिकारिक उपाधि नहीं, बल्कि उनकी सार्वजनिक छवि और लोकप्रिय धारणा को व्यक्त करने वाला नाम है। लेकिन उनकी हालिया कार्रवाई देखें तो यह उपनाम उनके समर्थकों को स्वाभाविक क्यों लगता है, इसकी वजह समझ आती है।
किसान परिवार से आईएएस बनने तक का सफर
तुकाराम हरिभाऊ मुंढे का जन्म 3 जून 1975 को महाराष्ट्र के बीड जिले के ताडसोना गांव में हुआ। उनका बचपन किसी बड़े शहर या विशेष सुविधाओं के बीच नहीं, बल्कि एक सामान्य किसान परिवार में बीता।
उनके पिता हरिभाऊ मुंढे किसान थे और मां असरबाई ने परिवार संभाला। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े तुकाराम ने पढ़ाई के साथ खेत के काम में भी हाथ बंटाया। शुरुआती शिक्षा जिला परिषद स्कूल से हुई। आगे चलकर उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की और यूपीएससी की तैयारी शुरू की। मेहनत का परिणाम यह रहा कि उन्होंने में यूपीएससी सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन ऑल इंडिया रैंक 20 हासिल की और 2005 बैच के आईएएस अधिकारी बने।
यहीं से शुरू हुआ उस अधिकारी का सफर, जिसकी पहचान आगे चलकर महाराष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था में अलग अंदाज के लिए बनने वाली थी।
कुर्सी पर बैठने वाले नहीं, मैदान में उतरने वाले अधिकारी
मुंढे की कार्यशैली का सबसे चर्चित पहलू उनका फील्ड में सक्रिय रहना रहा है। प्रशासनिक पद पर रहते हुए वे केवल फाइलों तक सीमित रहने के बजाय मौके पर जाकर स्थिति देखने और अधिकारियों से जवाब मांगने के लिए जाने जाते हैं।
उनकी सार्वजनिक छवि में एक बात लगातार दिखाई देती है, नियम किसी व्यक्ति या संस्था से बड़ा है।
इसी वजह से उनकी कार्यशैली कई बार चर्चा में आती है। समर्थक इसे ईमानदार और निडर प्रशासन मानते हैं, जबकि आलोचक उनके कुछ फैसलों को जरूरत से ज्यादा सख्त बताते रहे हैं। यही विरोधाभास उन्हें दूसरे अधिकारियों से अलग बनाता है।
एफडीए आयुक्त बने तो शुरू हुआ छापों का दौर
मई 2026 में महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त की जिम्मेदारी संभालने के बाद उनका नाम एक बार फिर सुर्खियों में आया।
मिलावटी दूध, नकली पनीर, प्रतिबंधित गुटखा-पान मसाला, अस्वच्छ खाद्य प्रतिष्ठानों और खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन के खिलाफ एफडीए की कार्रवाई तेज हुई।
रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआती अवधि में बड़ी संख्या में खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। गुटखा और प्रतिबंधित पान मसाले के खिलाफ कार्रवाई में कई प्रतिष्ठानों की जांच, FIR और गिरफ्तारियां भी सामने आईं।
यहां मुंढे की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—सिर्फ नियम बनाने की बात नहीं, बल्कि नियमों को जमीन पर लागू कराने की कोशिश।
गुटखा नेटवर्क पर कड़ा प्रहार
एफडीए की कार्रवाई में प्रतिबंधित गुटखा और पान मसाले का नेटवर्क भी निशाने पर रहा। मई 2026 में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, महज तीन दिनों में 53 प्रतिष्ठानों की जांच, 34 स्थानों पर प्रतिबंधित उत्पाद मिलने और उसके बाद एफआईआर तथा गिरफ्तारियों की कार्रवाई की गई।
यह कार्रवाई इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि प्रशासन ने इसे केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित रखने के बजाय आपूर्ति नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश की।
मिलावटी दूध पर भी सख्त रुख
खाद्य सुरक्षा के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक दूध में मिलावट है। हालिया बैठकों में मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात सामने आई।
गंभीर मामलों में मकोका जैसे कड़े कानूनों के इस्तेमाल की बात भी कही गई। इसका उद्देश्य केवल मिलावटी सामान जब्त करना नहीं, बल्कि संगठित तरीके से चल रहे नेटवर्क पर कार्रवाई करना बताया गया।
होटल से लेकर बस स्टैंड की कैंटीन तक निगरानी
मुंढे के नेतृत्व में खाद्य प्रतिष्ठानों की स्वच्छता और खाद्य गुणवत्ता की जांच भी चर्चा में रही। औरंगाबाद के एसटी बस स्टैंड की कैंटीन पर कार्रवाई इसका एक उदाहरण बनी। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वच्छता संबंधी गंभीर कमियां मिलने के बाद कैंटीन का लाइसेंस रद्द कर उसे सील किया गया। यानी कार्रवाई का दायरा केवल बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, जहां आम आदमी खाना खाता है, वहां के मानकों पर भी निगरानी की गई।
अखबार में खाना परोसने पर भी सख्ती
खाने को अखबार में परोसने के मामले में भी एफडीए ने सख्ती दिखाई। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अखबार में खाद्य पदार्थ परोसने से संबंधित नियम पहले से मौजूद खाद्य सुरक्षा मानकों का हिस्सा हैं। मुंढे की भूमिका इन नियमों को नया बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा नियमों के अनुपालन को सख्ती से लागू कराने की रही।
यह छोटी लगने वाली बात दरअसल खाद्य सुरक्षा की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।
21 साल की नौकरी और करीब 25 तबादले
तुकाराम मुंढे के करियर का एक और चर्चित अध्याय है, उनके तबादले। विभिन्न रिपोर्टों में 21 साल की सेवा के दौरान उनके करीब 25 तबादलों का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग स्रोतों में संख्या में अंतर हो सकता है, लेकिन यह तथ्य उनकी प्रशासनिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इतने तबादलों के बावजूद उनकी सार्वजनिक पहचान कमजोर होने के बजाय कई बार और मजबूत होती दिखाई दी।
यही वजह है कि उनके समर्थकों के बीच एक धारणा बनी कि तबादला उनकी कार्यशैली को बदलने में सफल नहीं हुआ। हालांकि पत्रकारिता की दृष्टि से यह कहना उचित नहीं होगा कि हर तबादला केवल उनकी ईमानदारी या किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम था। हर तबादले के पीछे प्रशासनिक कारण अलग हो सकते हैं।
सादगी और अनुशासन की छवि
मुंढे की निजी जिंदगी के बारे में बहुत अधिक आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि आम तौर पर सादगी, अनुशासन और काम को प्राथमिकता देने वाले अधिकारी की रही है। उनकी लोकप्रियता किसी आलीशान जीवनशैली या सोशल मीडिया की चमक पर नहीं, बल्कि उनके प्रशासनिक फैसलों और फील्ड एक्शन पर बनी। यही वजह है कि उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे अधिकारी के रूप में देखते हैं, जो पद को सुविधा नहीं बल्कि जिम्मेदारी मानता है।
क्या हर कार्रवाई सही है? सवाल भी जरूरी हैं
तुकाराम मुंढे की कहानी को केवल प्रशंसा की कहानी बनाना पत्रकारिता की दृष्टि से अधूरा होगा।
उनकी सख्त कार्यशैली को लेकर आलोचनाएं भी हुई हैं और कुछ मामलों में न्यायपालिका की टिप्पणियां भी सामने आई हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट की एक टिप्पणी में एफडीए की कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाए गए थे।
इसलिए मुंढे की कहानी का दूसरा पक्ष भी है, सख्ती के साथ कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकारों की सीमाओं का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही किसी अधिकारी के काम का वास्तविक मूल्यांकन है।
‘सिंघम’ नाम क्यों पड़ा?
किसी अधिकारी को ‘सिंघम’ कहना सिर्फ इसलिए पर्याप्त नहीं कि उसने छापे मारे या कार्रवाई की। इस नाम के पीछे आम लोगों की वह धारणा है जिसमें एक अधिकारी को निडर, दबाव से बेपरवाह और नियमों को लागू कराने वाला माना जाता है।
तुकाराम मुंढे की सार्वजनिक छवि इसी धारणा के आसपास बनी है।
लेकिन उनकी असली पहचान किसी फिल्मी किरदार से नहीं, बल्कि एक आईएएस अधिकारी के रूप में उनके निर्णयों से तय होती है।
किसान परिवार से निकला एक युवक, यूपीएससी में देशभर में 20वीं रैंक हासिल करता है, आईएएस बनता है, बार-बार तबादलों का सामना करता है और फिर भी अपनी सख्त प्रशासनिक शैली के लिए लगातार चर्चा में रहता है, तुकाराम मुंढे की कहानी इसी सफर की कहानी है।
और शायद यही कारण है कि महाराष्ट्र में आज भी जब सख्त आईएएस अधिकारी की चर्चा होती है, तो तुकाराम मुंढे का नाम सबसे पहले लिए जाने वाले नामों में शामिल होता है।

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