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बीबीएयू में छात्रों पर मुकदमे, आवाज उठाने की मिली सजा
लखनऊ। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में छात्रों पर एफआईआर और निलंबन की कार्रवाई को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय की मूलभूत सुविधाओं और छात्र हितों से जुड़े मुद्दे उठाने के बाद उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए और कई छात्रों को निलंबित कर दिया गया।
छात्रों के मुताबिक 28 अप्रैल 2026 को विश्वविद्यालय में प्रदर्शन के बाद करीब 16 नामजद और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। वहीं करीब 30 छात्रों को निलंबन या निष्कासन संबंधी नोटिस दिए जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि एफआईआर की आधिकारिक प्रति और विश्वविद्यालय की ओर से कार्रवाई का विस्तृत कारण सार्वजनिक रूप से सामने आना बाकी है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बनाया आधार

प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि वे छात्रावास में भोजन की गुणवत्ता, पीएचडी प्रवेश में देरी, आवेदन शुल्क बढ़ाने और विश्वविद्यालय के गेटों के समय से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठा रहे थे। छात्रों का दावा है कि एक छात्रा की मौत के मामले में जवाबदेही की मांग को लेकर भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में जुटे थे। छात्रों का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान हुई तोड़फोड़ और अन्य घटनाओं के लिए उन विद्यार्थियों को निशाना बनाया गया, जो पहले से छात्र समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे थे। छात्रों ने कहा कि उन पर वीसी आवास में घुसकर तोड़फोड़ और लूटपाट करने जैसे आरोप लगाए गए हैं, लेकिन उन्हें अब तक कथित चोरी या नुकसान से जुड़ा कोई स्पष्ट सबूत नहीं दिखाया गया।
निलंबन की अवधि पूरी, प्रवेश नहीं देने का आरोप

पीएचडी छात्र ने दावा किया कि उसे दो महीने के निलंबन के साथ 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। उसका कहना है कि निलंबन की अवधि पूरी होने के बाद भी विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश नहीं दिया जा रहा और जुर्माना जमा करने के बाद ही प्रवेश देने की बात कही जा रही है। छात्रों का कहना है कि उन्होंने निलंबन के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन को ई-मेल और बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के समक्ष अपील की, लेकिन अब तक अंतिम निर्णय नहीं बताया गया है।
एससी-एसटी छात्रों को निशाना बनाने का आरोप
प्रदर्शनकारी छात्रों ने कार्रवाई में जातिगत पक्षपात का आरोप भी लगाया है। उनका दावा है कि जिन छात्रों के खिलाफ कार्रवाई हुई, उनमें बड़ी संख्या एससी-एसटी समुदाय से आने वाले विद्यार्थियों की है। छात्रों ने सवाल उठाया कि यदि प्रदर्शन में सैकड़ों विद्यार्थी शामिल थे तो कार्रवाई की सूची में एक खास समुदाय के छात्रों की संख्या अधिक क्यों है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भी इस आरोप पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
छात्रों की रक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
छात्रों ने आगामी दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से भी मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई की समीक्षा करनी चाहिए और यदि आरोप साबित नहीं होते हैं तो निलंबन व निष्कासन वापस लिया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारी छात्रों ने चेतावनी दी है कि उनकी मांगों पर जल्द निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। वहीं छात्रों का कहना है कि उनका उद्देश्य विश्वविद्यालय में मूलभूत सुविधाओं और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को उठाना है।
इस पूरे मामले में अब विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक पक्ष महत्वपूर्ण होगा, ताकि एफआईआर, निलंबन और छात्रों पर लगाए गए आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

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