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कूड़ा बीनकर बच्चों का भविष्य संवारने की जंग

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ग्रेटर नोएडा। चमचमाती इमारतों और विकसित शहरों के बीच एक ऐसी दुनिया भी बसती है, जहां लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रेटर नोएडा के कासना क्षेत्र में नाले के किनारे बनी झुग्गी बस्ती में रहने वाले दर्जनों परिवार कूड़ा बीनकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों की सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों का भविष्य है, जिन्हें वे गरीबी के कारण पढ़ा नहीं पा रहे हैं।

बस्ती में रहने वाले अधिकांश परिवार असम और अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में यहां पहुंचे थे। लेकिन बेहतर जिंदगी की उम्मीद लेकर आए ये लोग आज भी गंदगी, बदहाली और अभावों के बीच जीने को मजबूर हैं।

नाले के किनारे बसी जिंदगी

बस्ती तक पहुंचने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है। लोग एक संकरी पट्टी से होकर गुजरते हैं, जिसके बगल में गहरा नाला बहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार बच्चे और बुजुर्ग फिसलकर गिरने से बाल-बाल बचे हैं।
एक महिला बताती हैं, हम लोग तीन साल से यहां रह रहे हैं। बोतल, प्लास्टिक और कबाड़ बीनकर बेचते हैं। उसी से घर चलता है। महीने में मुश्किल से 10 से 12 हजार रुपए तक आ पाते हैं। परिवारों का कहना है कि कमाई इतनी नहीं होती कि बच्चों की पढ़ाई, खाना और इलाज सब कुछ एक साथ चल सके।

पैसे नहीं थे, इसलिए बच्चे का नाम कट गया

बस्ती में रहने वाले कई परिवार अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी उनके सपनों के आड़े आ रही है। एक पिता ने बताया कि उन्होंने बेटे का दाखिला प्राइवेट स्कूल में कराया था, लेकिन फीस नहीं भर पाने के कारण बच्चे का नाम कटवाना पड़ा।

उन्होंने कहा, हम चाहते हैं कि बच्चे पढ़-लिख जाएं, लेकिन फीस भरने के पैसे नहीं हैं। दिनभर मेहनत करते हैं, फिर भी घर चलाना मुश्किल हो जाता है।

एक अन्य महिला ने कहा कि उनके चार बच्चों में से तीन पढ़ रहे हैं, जबकि एक बच्चे की बीमारी से मौत हो चुकी है। परिवार का अधिकांश पैसा स्कूल फीस और खाने-पीने में खर्च हो जाता है।

झुग्गी में ही रसोई, बाथरूम और जिंदगी

इन परिवारों के छोटे-छोटे टीन और प्लास्टिक से बने घरों में ही रसोई है, वहीं सोने की जगह है और बगल में अस्थायी बाथरूम भी बना हुआ है। चूल्हे पर खाना बनता है और उसी धुएं व गंदगी के बीच बच्चे बड़े हो रहे हैं।
एक मजदूर ने कहा, गरीब आदमी हर चीज में एडजस्ट कर लेता है। सपना तो हमारा भी अच्छा घर और अच्छी जिंदगी का है, लेकिन मजबूरी में यही जिंदगी जी रहे हैं।

अपने पैसों से लगाया पानी का नल

बस्ती में पहले पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोगों को दूर से पानी लाना पड़ता था। बाद में मजदूरी और कबाड़ बेचकर जमा किए पैसों से लोगों ने खुद मिलकर पानी का नल लगवाया। स्थानीय निवासी बताते हैं कि सरकार की तरफ से उन्हें कोई विशेष सहायता नहीं मिली। रोजगार, आवास और शिक्षा जैसी सुविधाएं आज भी उनसे दूर हैं।

सुबह कमाओ, शाम को खाओ

बस्ती के युवाओं का कहना है कि उनकी जिंदगी रोज कमाने और खाने तक सीमित होकर रह गई है। स्थायी रोजगार नहीं होने के कारण वे कूड़ा छांटने और बेचने का काम करते हैं।

एक युवक ने कहा, हम लोगों की जिंदगी बस सुबह काम पर जाना और शाम को लौट आना रह गई है। ना कोई तरक्की है, ना भविष्य की उम्मीद। बच्चे पढ़ जाएं, बस यही सपना है।

विकास के दावों पर सवाल

स्थानीय लोगों की हालत देखकर विकास के दावों पर सवाल खड़े होते हैं। जहां एक ओर देश में विकसित भारत की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवार आज भी खुले नालों के किनारे असुरक्षित हालात में रहने को मजबूर हैं।

बस्तीवासियों की मांग है कि सरकार उनके लिए सुरक्षित आवास, बच्चों की शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करे ताकि उनके बच्चों का भविष्य बेहतर बन सके।

बच्चों की शिक्षा के लिए मदद की अपील

बस्ती में रहने वाले छोटे-छोटे बच्चों की आंखों में भी स्कूल जाने और आगे बढ़ने के सपने हैं। लेकिन आर्थिक तंगी के कारण ये सपने अधूरे रह जाते हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों से अपील की जा रही है कि इन बच्चों की शिक्षा और जीवन सुधार के लिए आगे आएं।
गरीबी में बीत रहा इन बच्चों का बचपन शायद बेहतर शिक्षा और सरकारी सहायता से बदल सकता है।

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