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जहां झुग्गी, वहीं मकान के दावों के बीच बेघर हुए सैकड़ों परिवार, शिव बस्ती के लोगों ने सुनाई दर्दभरी दास्तान
नई दिल्ली। रामा रोड स्थित शिव कैंप-शिव बस्ती में कभी सैकड़ों परिवारों की जिंदगी बसती थी। आज वहां सिर्फ मलबा, टूटी दीवारों के निशान और उजड़े आशियानों की खामोशी बची है। जिस जगह कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब जंगल जैसी वीरानी नजर आती है।
बतंगड़ टीम जब शिव बस्ती पहुंची, तो वहां रहने वाले कई परिवारों ने अपना दर्द साझा किया। लोगों का कहना है कि कुछ महीने पहले तक यहां पूरी बस्ती आबाद थी, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई के बाद झुग्गियां तोड़ दी गईं और सैकड़ों लोग बेघर हो गए। ग्रामीणों और मजदूर परिवारों का आरोप है कि सरकार ने जहां झुग्गी, वहीं मकान का वादा किया था, लेकिन उन्हें न पुनर्वास मिला और न ही रहने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था। अब कई परिवार किराए के कमरों, पुलों के नीचे और सड़कों के किनारे जिंदगी बिताने को मजबूर हैं।
पांच बच्चों को लेकर कहां जाएं?

पति की मौत के बाद भीख मांगकर बच्चों का पेट भर रही महिला
बस्ती में रहने वाली एक महिला ने बताया कि उसके पति की मौत हो चुकी है और अब वह पांच बच्चों के साथ दर-दर भटक रही है।
महिला ने कहा, पहले झुग्गी थी तो कम से कम बच्चों को छोड़कर काम पर चली जाती थी। अब घर भी नहीं रहा। कभी पुल के नीचे सोते हैं, कभी लालबत्ती के पास। बच्चों को लेकर भीख मांगनी पड़ती है। उसकी आंखों में डर और बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। उसने कहा कि किराए के मकान का खर्च उठाना उनके बस की बात नहीं है। छोटा सा कमरा भी 6-7 हजार रुपये में मिलता है। इतना किराया भरें या बच्चों को खाना खिलाएं?
हमारी झुग्गी टूटी, बाकी बच गई
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई केवल कुछ चुनिंदा झुग्गियों पर हुई, जबकि आसपास कई जगहों पर आज भी रेलवे लाइन के बेहद करीब झुग्गियां बनी हुई हैं।
सुदर्शन ने कहा, हमारे घर पटरी से दूर थे, फिर भी तोड़ दिए गए। लेकिन जहां घर बिल्कुल पटरी से सटे हैं, वहां कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे लोगों में भेदभाव की भावना पैदा हुई है।
लोगों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी उनकी मदद के लिए सामने नहीं आया। कई परिवारों का सामान तक सड़क पर फेंक दिया गया।
वोट के समय वादे, बाद में कोई नहीं आता
बस्तीवासियों ने सरकार पर चुनावी वादे निभाने में विफल रहने का आरोप लगाया। कई लोगों ने कहा कि चुनाव के समय नेता गरीबों के बीच आते हैं, लेकिन जीतने के बाद उनकी समस्याओं की सुध नहीं लेते।
एक महिला ने कहा, जब चुनाव आता है तो सब वोट मांगने आते हैं। लेकिन जीतने के बाद कोई नहीं पूछता कि गरीब कैसे जी रहा है।
कुछ लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं में राहत मिलती थी।
बच्चों की शिक्षा पर भी संकट
सबसे बड़ी चिंता उन बच्चों को लेकर है, जिनकी पढ़ाई और भविष्य दोनों अधर में लटक गए हैं। स्थायी घर न होने के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे और कई परिवार रोजी-रोटी की जद्दोजहद में बच्चों को भी साथ लेकर सड़कों पर निकलने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार झुग्गियां हटाती है, तो पहले पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि गरीब परिवार सड़क पर आने से बच सकें।
सवाल अब भी कायम
शिव बस्ती की उजड़ी तस्वीर कई बड़े सवाल खड़े करती है,
क्या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के साथ मानवीय पहलू पर भी उतना ही ध्यान दिया गया?
क्या गरीब परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए?
और आखिर जहां झुग्गी, वहीं मकान का वादा जमीन पर कब उतरेगा?
फिलहाल शिव बस्ती के लोग अपने टूटे घरों और अधूरी उम्मीदों के साथ सरकार से सिर्फ एक मांग कर रहे हैं, हमें भी इंसान समझा जाए, और सिर छुपाने के लिए एक सुरक्षित जगह दी जाए।
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