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गड्ढों में रोड या रोड में गड्ढे?’ लोनी-सहारनपुर हाईवे बना ‘डेंजर ज़ोन’, तंग आकर लोग बोले ‘मन करता है आत्महत्या कर लें

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गाजियाबाद। सरकार जहाँ एक तरफ़ बेहतरीन एक्सप्रेस-वे और चमचमाती सड़कों के दम पर सूबे को करप्शन-मुक्त और विकासशील बनाने का दावा कर रही है, वहीं दिल्ली से सटे गाजियाबाद के लोनी इलाके की जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ा रही है। लोनी का मुख्य सहारनपुर हाईवे आज किसी ‘एडवेंचर पार्क’ या ‘मौत के जाल’ से कम नहीं रह गया है। सड़कों पर बने कई फीट गहरे और कीचड़-पानी से लबालब गड्ढे आए दिन किसी बड़े हादसे को न्यौता दे रहे हैं। बदहाली का आलम यह है कि यहाँ के स्थानीय निवासी और राहगीर इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि वे अब ऑन-कैमरा यह कहने को मजबूर हैं, यहाँ इतनी दिक्कत है कि ऐसा लगता है लोग आत्महत्या कर लें।

27 साल से जस की तस स्थिति, ‘डबल इंजन’ का पहिया पानी में?

साल 2026 में भी उत्तर प्रदेश के इस महत्वपूर्ण मार्ग की दुर्दशा सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह समस्या एक या दो महीने की नहीं, बल्कि दशकों पुरानी है। लोनी के ही एक निवासी ने आक्रोश जताते हुए कहा, मेरी उम्र 27 साल हो गई है और मैं जन्म से ही इस रोड को ऐसा ही देख रहा हूँ। आज तक यह रोड नहीं बन पाई।
सड़क पर टैक्स देने के बावजूद लोगों को गड्ढों की सौगात मिल रही है। मेरठ से आ रहे एक कमर्शियल गाड़ी के ड्राइवर सुहेल ने बताया, हम हर साल गाड़ी का ₹5,500 टैक्स भरते हैं। टैक्स में जरा सी भी देरी हो तो लंबी पेनाल्टी ठोक दी जाती है, लेकिन टैक्स के बदले हमें ये टूटी सड़के मिल रही हैं जिससे गाड़ियों का नाश हो रहा है। मेरठ की सड़कें तो फिर भी सुधर गई हैं, लेकिन यहाँ के नेता बिल्कुल ध्यान नहीं देते।

डेली गाड़ियां पलटती हैं, किसी को फर्क नहीं पड़ता

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान हाईवे की हालत यह थी कि भारी-भरकम ओवरलोडेड ट्रॉलियां और रिक्शे तिरछे होकर हिचकोले खाते हुए निकल रहे थे। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार, यहाँ हर दिन दो-चार रिक्शे और बाइकें पलट जाती हैं। किसी न किसी का हाथ-पैर टूटना यहाँ की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कल ही एक राहगीर का पैर टूट गया, लेकिन नेताओं से लेकर पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों तक, किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही।
विधायक के नाम से खौफ, सवाल पूछने पर मिलता है रूखा जवाब
इस पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी स्थानीय विधायक नंद किशोर गुर्जर और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत आती है। हैरानी की बात यह है कि जब जनता से जनप्रतिनिधियों के बारे में पूछा जाता है, तो विकास पर बात करने के बजाय लोगों के चेहरे पर डर साफ़ देखा जा सकता है। लोग दबी जुबान में कहते हैं कि विधायक पावरफुल हैं, इसलिए उनसे डर लगता है।
वहीं कुछ ग्रामीणों ने नेताओं के अहंकार की पोल खोलते हुए बताया कि जब कभी सड़क बनवाने की मांग की जाती है, तो सीधा जवाब मिलता है, वोट तो हमें दिया नहीं तुमने, फिर किस हक से मांग रहे हो? जनता अब यह सवाल उठा रही है कि अगर यहाँ के 1 लाख से अधिक राहगीरों और स्थानीय लोगों ने वोट नहीं दिया, तो बिना वोट के माननीय चुनाव कैसे जीत गए?

मुद्दे उठाने वाले से बहस, सिस्टम की जवाबदेही पर सन्नाटा

पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग और सहारनपुर हाईवे की इस दुर्दशा के बीच एक कड़वी सच्चाई यह भी सामने आई कि जब इस बदहाली को मीडिया के माध्यम से उठाने की कोशिश की जाती है, तो कुछ लोग अपनी कॉलर चमकाने और जाम का बहाना बनाकर कवरेज रोकने का प्रयास करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि लोग रोज हादसों का शिकार हो रहे हैं, तो एक राहगीर ने गैर-जिम्मेदाराना लहजे में कहा, मर रहे हैं तो मरने दो, पर जाम मत लगाओ। यह संवेदनहीनता साफ़ दर्शाती है कि आम जनता भी उस तंत्र के खिलाफ खड़े होने से डरती है जो इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है।

जनता का बदला मूड, अब नहीं देंगे वोट

चुनावों के समय एक महीने तक हाथ जोड़ने वाले नेता आज वातानुकूलित और करोड़ों की गाड़ियों में सफर करते हैं, जिससे उन्हें इन गड्ढों का अहसास तक नहीं होता। लेकिन जनता के सब्र का बांध अब टूट रहा है। अपनी गलती स्वीकार करते हुए कई लोगों ने साफ कहा, वोट देकर हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई, लेकिन अब आने वाले समय में हम यह गलती नहीं दोहराएंगे।
क्या केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘विकसित प्रदेश’ के संकल्प में गाजियाबाद का लोनी क्षेत्र शामिल नहीं है? लोनी की जनता आज इस कीचड़ और नालेनुमा हाईवे पर खड़े होकर पूछ रही है कि आखिर किसी बड़ी जानमाल की क्षति के बाद ही इस प्रशासन की नींद टूटेगी या फिर यह मौत का सफर यूं ही जारी रहेगा?

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