देश
सरहद के आर-पार: सिंध से छूटी सांसें, राजस्थान में अटकी उम्मीदें
बाड़मेर। जब पीछे सिंध, लाड़काना और थारपकर जैसे अपने गांव छूट रहे थे और सामने मां भारती की धरती थी, उस वक्त न तो आंसू रुक रहे थे और न ही दिल की धड़कनें। ऐसा लग रहा था कि एक सांस वहीं पीछे जन्मभूमि के साथ छूट गई हो। पीछे दर्द था और सामने एक उम्मीद।
यह पंक्तियां किसी काल्पनिक कहानी की नहीं, बल्कि पाकिस्तान से विस्थापित होकर राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में रह रहे उन हजारों हिंदुओं की आंखों का पानी और दिल की टीस है, जो आज भी अपनों से मिलने और एक गरिमापूर्ण जीवन के लिए तरस रहे हैं। राजनीति की लकीरों ने एक झटके में देश तो बांट दिया, लेकिन वे उस ‘रोटी और बेटी’ के सदियों पुराने रिश्ते को नहीं बांट सकी जो आज भी राजस्थान और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच धड़कता है।
सरहद पार से शादी का संकट
सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में रहने वाले सोढ़ा राजपूतों और अन्य हिंदू परिवारों के सामने आज सबसे बड़ा संकट अपनी बहन-बेटियों के भविष्य का है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, एक ही गोत्र में शादियां नहीं हो सकतीं। चूंकि पाकिस्तान के उस हिस्से में एक ही गोत्र के हिंदू परिवार रहते हैं, इसलिए उन्हें विवाह के लिए अनिवार्य रूप से राजस्थान आना पड़ता है।
पाक विस्थापित संघ के कार्यकर्ताओं और पीड़ितों का कहना है, वहां हमारी 10-12 साल की मासूम बच्चियों की आबरू सुरक्षित नहीं है। जबरन शादियों और अत्याचारों की ऐसी कहानियां हैं जो दिल चीर देती हैं। हम यहां अपनी बच्चियों की शादियां करने आते हैं, लेकिन वीजा और प्रशासनिक पाबंदियों के कारण जिंदगियां अधर में लटकी हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और चार साल का मौन सन्नाटा
विस्थापितों के अनुसार, हाल के वर्षों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद से हालात बेहद पेचीदा हो गए हैं। सरहद पार जाने और वहां से आने वाले वीज़ा पर कड़े प्रतिबंध लग गए हैं।
बाड़मेर में रह रहे जगत सिंह सोढ़ा बताते हैं, मेरे पिता का देहांत 2015 में हो गया था, मेरी बूढ़ी मां आज भी पाकिस्तान में अकेली रहती हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद वीज़ा मिलना बंद हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी से गुहार है कि हमारे लिए यह बॉर्डर खोलें। वहीं अवतार सिंह की कहानी भी अलग नहीं है। उनका पूरा परिवार भारतीय नागरिकता पा चुका है, लेकिन उनके पिता दो साल पहले रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान गए थे और वीज़ा रद्द होने के कारण वहीं फंस कर रह गए। मां-बेटे और पिता-पुत्र ने चार साल से एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी है।
सीएए से मिली नागरिकता, पर धरातल पर पुनर्वास का इंतजार
केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन कानून में किए गए बदलावों की विस्थापितों ने सराहना की है। उनका कहना है कि अब खुफिया एजेंसियों की जांच और हिंदू संस्थाओं के एफिडेविट के बाद नागरिकता मिलने की प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। लेकिन असल समस्या नागरिकता मिलने के बाद शुरू होती है।
विस्थापितों का आरोप है कि जोधपुर और अन्य जिलों में उन पर जिले से बाहर न जाने के प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। राजस्थान की वर्तमान भजनलाल सरकार ने शुरुआती दिनों में विस्थापितों को आवास और अन्य सुविधाएं देने की घोषणा की थी, लेकिन पीड़ितों के अनुसार, धरातल पर अभी तक इसका लाभ नहीं दिख रहा है।
हमें भीख नहीं, स्वाभिमान और रोजगार चाहिए
नरपत सिंह धारा का कहना है, हम सरकारों से कोई खैरात या हजारों करोड़ की फंडिंग नहीं मांग रहे। हमारे हाथ-पैर सलामत हैं, हम मेहनत मजदूरी करके दो वक्त की रोटी कमा सकते हैं। हमें बस इज्जत दीजिए, स्वाभिमान दीजिए और सिर छुपाने के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा। अगर कोई यह सोचे कि हम मातृभूमि के खिलाफ जाएंगे, तो हमारे हाथ में बंदूक दे दीजिए, हम खुद गद्दारों को गोली मार देंगे। हम भारत को अपनी मां मानते हैं और इसी मिट्टी में समा जाना चाहते हैं।
राजनीतिक नेतृत्व और हिंदू समाज से तीखे सवाल
स्थानीय स्तर पर पतंगड़ मीडिया माध्यम से बात करते हुए विस्थापित नेताओं ने पाकिस्तान और भारत, दोनों तरफ के हिंदू नेतृत्व पर गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सिंध में भी हिंदुओं के वोट से सरकारें, एमपी और एमएलए बनते हैं, लेकिन वे वहां हिंदुओं की सुरक्षा पर मौन हैं। वहीं भारत में राजस्थान के करीब 10 जिलों की विधानसभा सीटों पर विस्थापित हिंदू अपना राजनीतिक प्रभाव रखते हैं, इसके बावजूद देश की संसद और विधानसभाओं में उनकी प्रताड़ना और पुनर्वास पर कोई ठोस आवाज नहीं उठाता।
हिंदुत्व और शरणार्थियों के कल्याण की बात करने वाली सरकारों के लिए यह जमीनी हकीकत एक आईना है। जब तक सरहद की यह कड़वाहट कागजी आश्वासनों से निकलकर मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर हल नहीं की जाएगी, तब तक थार की इस तपती रेत में अपनों से बिछड़ने और स्वाभिमान खोने का यह दर्द यूं ही दफन रहेगा।
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