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10 साल से बंद पड़ी बादलपुर सब्जी मंडी: ₹1.40 करोड़ की परियोजना बनी बदहाली और अव्यवस्था की मिसाल
ग्रेटर नोएडा | बादलपुर क्षेत्र में वर्ष 2016 में करीब ₹1 करोड़ 40 लाख की लागत से बनाई गई सब्जी मंडी आज भी शुरू नहीं हो सकी है। दस साल बीत जाने के बावजूद मंडी बंद पड़ी है और अब इसकी स्थिति जर्जर हो चुकी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी धन खर्च होने के बावजूद मंडी का लाभ न किसानों को मिला और न ही छोटे व्यापारियों को। बादलपुर, जो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का पैतृक गांव भी माना जाता है, वहां बनी इस मंडी की हालत अब प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बयां कर रही है।
दुकानों पर ताले, परिसर में गंदगी
मंडी परिसर में बनी दुकानों पर वर्षों से ताले लगे हुए हैं। कई तालों में जंग लग चुकी है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लंबे समय से इनका उपयोग नहीं हुआ। स्थानीय लोगों के अनुसार, दुकानों का आवंटन स्पष्ट रूप से नहीं किया गया और कई स्थानों का निजी उपयोग हो रहा है। परिसर में जगह-जगह गंदगी फैली हुई है। नालियां जाम हैं और सफाई व्यवस्था लगभग ठप दिखाई देती है।
असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बनने का आरोप
स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि मंडी के बंद रहने के कारण यह परिसर असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है। यहां शराब की बोतलें और अन्य कचरा खुलेआम पड़ा मिला। लोगों का कहना है कि यदि मंडी नियमित रूप से संचालित होती, तो छोटे सब्जी विक्रेताओं और किसानों को सुविधा मिलती और परिसर का दुरुपयोग नहीं होता।
शौचालयों पर ताले, लोगों को खुले में जाने की मजबूरी
मंडी में बने सार्वजनिक शौचालयों पर ताले लगे होने का मामला भी सामने आया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि शौचालयों का उपयोग कुछ निजी लोगों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है, जबकि आम जनता को खुले में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बाजार लगने के दिनों में महिलाओं और बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। लोगों का कहना है कि कई बार रात में अंधेरे और गंदगी के कारण दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।
सफाई बजट पर उठे सवाल
स्थानीय व्यापारियों और निवासियों का दावा है कि मंडी की सफाई के लिए नियमित बजट आता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई सफाई नजर नहीं आती।
लोगों ने आरोप लगाया कि सफाई और रखरखाव के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई हो रही है, जबकि वास्तविक स्थिति बेहद खराब है।
किसानों और छोटे व्यापारियों को नहीं मिला लाभ
स्थानीय सब्जी विक्रेताओं का कहना है कि यदि मंडी शुरू हो जाती, तो उन्हें व्यवस्थित स्थान मिलता और रोजमर्रा के कारोबार में सुविधा होती।
वर्तमान में बाजार अस्थायी रूप से लगाया जाता है, लेकिन मंडी परिसर का उपयोग नहीं हो पा रहा।
राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
स्थानीय लोगों ने पूर्व और वर्तमान सरकार दोनों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि परियोजना समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान शुरू हुई थी, लेकिन बाद की सरकारों ने भी इसे चालू कराने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि मंडी शुरू नहीं हो सकी, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
बादलपुर की यह सब्जी मंडी अब विकास परियोजनाओं की विफलता का उदाहरण बनती जा रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता को न सुविधा मिली, न रोजगार और न ही स्वच्छ व्यवस्था।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं और क्या वर्षों से बंद पड़ी यह मंडी कभी वास्तव में आम लोगों के काम आ पाएगी।

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