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रेगिस्तान की तपिश पर भारी पड़ा शादी का उत्साह: धूल के बवंडर और पानी की किल्लत के बीच बज रही शहनाई

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बाड़मेर। दूर-दूर तक फैला थार का रेगिस्तान, उड़ती हुई धूल के बवंडर, झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और गले को सुखा देने वाली पानी की भयंकर किल्लत। राजस्थान के बाड़मेर जिले के सीमावर्ती गांवों की यह वो कड़वी हकीकत है, जिससे यहां के लोग रोज दो-दो हाथ करते हैं। लेकिन, जब बात रिश्तों के जुड़ने और शादियों के जश्न की हो, तो रेगिस्तान की ये तमाम मुश्किलें यहां के पारंपरिक उत्साह के आगे घुटने टेक देती हैं।
हाल ही में बाड़मेर के ग्रामीण इलाकों में ऐसा ही एक नजारा देखने को मिला, जहाँ धूल के गुबार और पानी के संकट के बीच भी महिलाओं के पारंपरिक लोकगीत गूंज रहे हैं और खुशियों का माहौल है।

दूल्हा खुश है, पर दुल्हन के आने पर पानी की चिंता है

इस इलाके में सबसे बड़ी समस्या पानी की है। स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, यहाँ पीने के पानी की भारी किल्लत है। शादी के इस माहौल में भी सबसे बड़ा खर्च और चिंता पानी की ही है।
पानी की बहुत कमी है भाई। यहाँ ₹1500 से ₹2000 में एक पानी का टैंकर मंगवाना पड़ता है, वो भी कई बार केमिकल युक्त होता है।

हैरानी की बात यह है कि इस पानी के संकट का असर यहाँ के युवाओं के रिश्तों पर भी पड़ता है। चर्चाओं और स्थानीय दावों के मुताबिक, कई बार पानी की भीषण कमी के कारण लड़कियां इन इलाकों में ब्याह कर आने से कतराती हैं। कल्याणपुर और दुनारा के पास से अपनी दुल्हन लाने जा रहे एक दूल्हे ने बताया, रिश्ता होने में भी दिक्कतें आती हैं, क्योंकि यहाँ पानी की किल्लत बहुत है। दुल्हन आएगी तो परेशानी तो होगी, लेकिन टैंकर मंगवाकर काम चलाना पड़ेगा।” इसके बावजूद, दूल्हा ट्रैक्टर पर अपनी बारात लेकर पूरे उत्साह के साथ रवाना हुआ।

धूल का बवंडर भी नहीं रोक पाया लोकगीतों की तान

शादी के इस माहौल के बीच अचानक मौसम ने करवट ली और रेगिस्तान में तेज हवाओं के साथ रेत का भीषण तूफान आ गया। देखते ही देखते पूरे घर और कपड़ों पर धूल की परत जम गई। लेकिन, इस बिगड़ते मौसम के बाद भी महिलाओं का उत्साह कम नहीं हुआ। ‘तिमड़ियों’, ‘करतियो’, ‘मठियों’ तथा गले में ‘कंठी’ पहने ग्रामीण महिलाओं ने लोकगीत गाना जारी रखा। महिलाओं का कहना है कि शादियों और जश्न के मौके बहुत कम आते हैं, ऐसे में रेत उड़े या तूफान आए, जश्न तो मनेगा ही।

चार दिनों का अनूठा उत्सव: जानिए रेगिस्तानी शादियों की रस्में
ग्रामीण महिलाओं ने बातचीत में यहाँ की अनूठी और पारंपरिक चार दिवसीय शादी की रस्मों को साझा किया, यहाँ की शादियों में बारात के साथ घर की औरतें नहीं जाती हैं। जब बारात चली जाती है, तो औरतें घर पर रहकर सामूहिक रूप से काम करती हैं, खाना बनाती हैं और मंगल गीत गाकर दूल्हा-दुल्हन के सुरक्षित लौटने की कामना करती हैं।

मिट्टी के चूल्हे और कच्चे मकानों में सिमटी जिंदगी

इस आधुनिक युग में भी यहाँ का कल्चर पूरी तरह जमीन से जुड़ा हुआ है। भीषण गर्मी से बचने के लिए यहाँ आज भी मिट्टी और घास-फूस से बने ‘कुड़के’ बनाए जाते हैं, जो गर्मी में ठंडे रहते हैं। गैस सिलेंडरों की उपलब्धता पर कुछ पाबंदियों और दिक्कतों के चलते, शादियों जैसे बड़े आयोजनों में आज भी लकड़ियाँ और कोयला इकट्ठा करके बाहर खुले में चूल्हे बनाए जाते हैं, जहाँ भारी गर्मी के बीच भी हलवाई और परिवार के लोग खाना तैयार करते हैं।

बाड़मेर के इन धोरों में मुश्किलें हजार हैं, चाहे वह पानी के लिए ₹2000 का खर्च हो या धूल का तूफान। लेकिन इन सबके बीच यहाँ के लोगों की मासूमियत, मेहमाननवाज़ी और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम यह साबित करता है कि थार के दिलों में खुशियों की नमी आज भी बरकरार है।

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