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बिहार की राजनीति का क्राइम चार्ट, जनसेवा का रास्ता या मुकदमों का महामार्ग?

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बिहार की राजनीति में चुनावी मौसम आते ही विकास, रोजगार और शिक्षा के वादों की गूंज सुनाई देती है। लेकिन चुनाव आयोग को सौंपे गए शपथ-पत्रों और विभिन्न रिपोर्टों पर नजर डालें तो एक दूसरा सच भी सामने आता है। यह सच उन नेताओं का है जिनकी राजनीतिक यात्रा के साथ-साथ आपराधिक मामलों की लंबी फेहरिस्त भी चलती रही है।

विडंबना यह है कि लोकतंत्र में जहां जनप्रतिनिधियों को कानून बनाने का अधिकार मिलता है, वहीं कई जनप्रतिनिधि खुद कानून के शिकंजे में फंसे नजर आते हैं। बिहार की राजनीति में ऐसे कई नाम हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी, अपहरण और आर्म्स एक्ट जैसे गंभीर मामलों का उल्लेख चुनावी हलफनामों में मिलता रहा है।

मुकदमों की दौड़ में कौन कितना आगे?

इस सूची में सबसे चर्चित नाम मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह का है, जिन पर लगभग 38 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं। हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद उनकी राजनीतिक पकड़ लंबे समय तक बनी रही।

पूर्णिया के पूर्व सांसद पप्पू यादव के खिलाफ भी विभिन्न समयों में 40 से अधिक आपराधिक मामलों का उल्लेख सामने आया है। हालांकि इनमें कई मामलों में अदालती प्रक्रियाएं और फैसले समय-समय पर स्थिति बदलते रहे हैं।

कुचायकोटे के विधायक अमरेंद्र कुमार पांडे उर्फ पप्पू पांडे पर भी एक दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। वहीं बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पुराने चुनावी हलफनामों में भी कई गंभीर मामलों का उल्लेख मिलता है।

पूर्व मंत्री और बेलागंज विधायक सुरेंद्र यादव, वैशाली के पूर्व सांसद रमा सिंह, पूर्व विधायक अखलाक अहमद, जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार, लालगंज के पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला तथा पूर्व मंत्री रामाधार सिंह जैसे नेताओं के नाम भी उन जनप्रतिनिधियों की सूची में शामिल रहे हैं जिनके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं।

जनता का भरोसा या मजबूरी की राजनीति?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि गंभीर आरोपों के बावजूद ऐसे नेता लगातार चुनाव कैसे जीतते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार के कई इलाकों में जातीय समीकरण, स्थानीय प्रभाव, संगठनात्मक ताकत और व्यक्तिगत नेटवर्क चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। कई बार मतदाता उम्मीदवार के आपराधिक रिकॉर्ड को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि कई मामलों में समर्थक इन नेताओं को मजबूत या प्रभावशाली छवि के रूप में देखते हैं। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना भी है। जिन पर कानून तोड़ने के आरोप हैं, वही कानून बनाने वाली विधानसभा और संसद तक पहुंच जाते हैं।

शपथ-पत्रों का सच और राजनीति का आईना

चुनाव आयोग के समक्ष दाखिल शपथ-पत्र लोकतंत्र में पारदर्शिता का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ये दस्तावेज बताते हैं कि जनता किस तरह के उम्मीदवारों को चुन रही है। हालांकि किसी भी मामले में अंतिम सत्य अदालत का फैसला ही होता है और केवल मुकदमा दर्ज होना किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करता। फिर भी सवाल कायम है कि क्या राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से बचेंगे जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं? या फिर चुनावी गणित हर बार नैतिकता पर भारी पड़ता रहेगा?

लोकतंत्र के लिए चेतावनी

बिहार ही नहीं, पूरे देश में राजनीति के अपराधीकरण पर लगातार चिंता जताई जाती रही है। अदालतों से लेकर चुनाव सुधार की मांग करने वाले संगठनों तक, सभी यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या लोकतंत्र का उद्देश्य जनसेवा है या मुकदमों के बीच सत्ता तक पहुंचने की प्रतिस्पर्धा?

जब किसी नेता की उपलब्धियों से पहले उसके खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या चर्चा का विषय बनने लगे, तो यह केवल राजनीति का नहीं बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य का भी गंभीर संकेत है। जनता को यह तय करना होगा कि वह अपने प्रतिनिधि का मूल्यांकन विकास के आधार पर करेगी या दबदबे और मुकदमों की लंबी सूची के आधार पर।

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