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अर्थव्यवस्था चमकाने की जिद या अपनों की अर्थी? सालेपुर में शराब के ठेकों के खिलाफ भड़का आक्रोश

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ग्रेटर नोएडा। एक तरफ सरकारी बोर्ड पर लिखा है, नशे की अवस्था में वाहन न चलाएं और ठीक उसी के नीचे खुलेआम मौत की बोतलें बेची जा रही हैं। सरकार अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए हमारे गांवों की सामाजिक व्यवस्था को दांव पर लगा रही है। यह तीखा आक्रोश ग्रेटर नोएडा के सालेपुर गांव के उन सैकड़ों ग्रामीणों का है, जो पिछले कई दिनों से गांव के मुहाने पर स्थित दो शराब के ठेकों को हटाने की मांग कर रहे हैं।
सालेपुर गांव की मुख्य सड़क पर स्थित ‘देसी शराब’ और ‘कंपोजिट बियर शॉप’ के खिलाफ आज महिलाओं और बच्चों ने सड़क पर उतरकर उग्र प्रदर्शन किया। हालांकि, मौके पर पहुंची पुलिस और आबकारी विभाग की टीम ने लाठी-डंडे और प्रशासनिक धौंस के बल पर प्रदर्शनकारियों को वहां से खदेड़ दिया, लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि भारी हंगामे और विरोध के बावजूद शराब की बिक्री एक पल के लिए भी बंद नहीं हुई। पुलिस की मौजूदगी में ही लोग धड़ल्ले से शराब खरीदते कैमरे में कैद हुए।

दो महीने में दो दर्जन मौतें, अनाथ हुए बच्चे

प्रदर्शन में शामिल बुजुर्गों और महिलाओं का दर्द इस बात से समझा जा सकता है कि इस छोटे से ग्रामीण इलाके में पिछले दो महीनों के भीतर अत्यधिक शराब पीने और उससे होने वाले हादसों के कारण 24 लोगों की मौत हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि मरने वालों में अधिकांश 18 से 30 वर्ष के युवा थे।
कई घर बर्बाद हो गए। नौजवान लड़के मर गए, उनकी विधवाएं आज मजदूरी कर बच्चों को पालने को मजबूर हैं। जब शराबी यहां हुड़दंग मचाते हैं, तो राह चलती बहू-बेटियों को मां-बहन की गंदी गालियां सुननी पड़ती हैं। यह ठेका हमारी जान का दुश्मन बन चुका है।

100% वोट देने वाले योगी समाज’ में भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी

सालेपुर गांव का राजनीतिक समीकरण भी इस आंदोलन में एक नया मोड़ ले आया है। प्रदर्शनकारियों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह गांव पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर रहा है। विधानसभा और जिला पंचायत चुनावों में यहां का योगी समाज 100 प्रतिशत वोट भाजपा को देता आया है।
ग्रामीणों ने आक्रोश जताते हुए कहा, क्या हमने ठेके खुलवाने और अपने बच्चों को मरवाने के लिए सरकार चुनी थी? अगर हमें पता होता कि यह सरकार हमारे साथ ऐसा करेगी, तो हम वोटों की जगह चप्पलों की माला से स्वागत करते। ग्रामीणों के अनुसार, वे स्थानीय विधायक, जिला अध्यक्ष, लेबर इंस्पेक्टर, पूर्ति अधिकारी और एसएसपी तक को पिछले तीन महीनों से लगातार लिखित शिकायत दे चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

प्रशासन का ‘पाँच दिन’ का अल्टीमेटम

हंगामे के बीच जब स्थानीय मीडिया ने आबकारी इंस्पेक्टर और पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ इनकार कर दिया। ग्रामीणों के भारी दबाव को देखते हुए कोतवाली थाना धनकौर प्रभारी और पूर्ति अधिकारी ने जनता से 5 दिन का समय मांगा है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि 5 दिनों के भीतर इन दोनों ठेकों को गांव की सीमा से बाहर शिफ्ट कर दिया जाएगा।

हालांकि, ग्रामीणों को इस आश्वासन पर कतई भरोसा नहीं है। उनका कहना है कि जब प्रशासन की नाक के नीचे आज भी ठेका बंद नहीं कराया जा सका, तो 5 दिन बाद क्या गारंटी है?

आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल से तीखे सवाल

ग्राउंड जीरो की यह तस्वीरें सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग और संबंधित मंत्री नितिन अग्रवाल की नीतियों पर सवालिया निशान खड़ी करती हैं। क्या राजस्व का टारगेट पूरा करना जनता की जान से बढ़कर है? ‘सुरक्षित मदिरा’ और ‘वैधानिक चेतावनी’ के बड़े-बड़े विज्ञापनों के पीछे छिपी यह भयावह हकीकत यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर विकास की इस अंधी दौड़ में ग्रामीण भारत की सामाजिक सुरक्षा कहां खड़ी है?
फिलहाल, सालेपुर के ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि अगर 5 दिन के भीतर ठेका नहीं हटा, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप अख्तियार करेगा।

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