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मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने पर सियासी संग्राम, कांग्रेस ने बताया लोकतंत्र पर हमला
मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त होने के बाद प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक घमासान मच गया है। कांग्रेस ने निर्वाचन अधिकारी के फैसले को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए चुनाव आयोग के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पार्टी का आरोप है कि जिस सीट पर उसकी जीत की संभावना मजबूत थी, उसी सीट पर उसके उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया गया।
नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचा और फैसले पर आपत्ति जताई। पार्टी नेताओं का कहना है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले को अदालत में चुनौती देगी।
सचिन पायलट ने उठाए गंभीर सवाल
कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के लोकतांत्रिक इतिहास में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण हो, जब किसी उम्मीदवार का नामांकन बिना स्पष्ट और ठोस कारण बताए निरस्त कर दिया गया हो। उन्होंने दावा किया कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ न तो कोई प्राथमिकी दर्ज है और न ही किसी अदालत में उनके विरुद्ध कोई चार्जशीट दाखिल हुई है।
पायलट ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई सुनियोजित तरीके से की गई है और चुनाव आयोग उनकी शिकायत सुनने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करेगी।
वोट की चोरी अब सीट की चोरी बन गई
नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने संख्या बल पूरी तरह अपने पक्ष में न होने के बावजूद तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारा था, जिससे उन्हें पहले ही राजनीतिक दबाव की आशंका होने लगी थी।
नटराजन ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, “जो बात पहले वोट की चोरी तक सीमित थी, वह अब सीट की चोरी बन गई है।” उन्होंने दावा किया कि उनके वकीलों ने निर्वाचन अधिकारी के समक्ष सभी कानूनी तर्क रखे, लेकिन उनकी दलीलों को गंभीरता से नहीं सुना गया।
किस आधार पर निरस्त हुआ नामांकन?
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है। सोमवार को नामांकन की अंतिम तिथि थी, जबकि मंगलवार को नामांकन पत्रों की जांच की गई।
भाजपा प्रत्याशी महेश केवट के अधिवक्ता संकेत गुप्ता ने दावा किया कि तेलंगाना की एक अदालत में मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है, जिसका उल्लेख उन्होंने अपने शपथपत्र में नहीं किया। गुप्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत उम्मीदवारों को अपने खिलाफ लंबित सभी आपराधिक मामलों की जानकारी शपथपत्र में देना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि इसी तथ्य को छिपाने के आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने नामांकन निरस्त किया है। वहीं, राज्य सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने फैसले को न्याय की जीत बताते हुए कहा कि भाजपा ने संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।
भाजपा-कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज
नामांकन विवाद को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला बता रही है, जबकि भाजपा इसे नियमों के पालन से जुड़ा मामला बता रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने फैसले को लोकतंत्र के लिए गंभीर झटका बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं नटराजन के नामांकन पत्र और शपथपत्र की जांच की है और उनमें ऐसी कोई जानकारी नहीं छिपाई गई थी, जिसका खुलासा कानून के तहत अनिवार्य हो।
तन्खा के अनुसार नटराजन के खिलाफ न तो कोई एफआईआर दर्ज थी और न ही कोई आपराधिक मुकदमा लंबित था। ऐसे में जानकारी छिपाने के आरोप का कोई आधार नहीं बनता।
धारा 223 के नोटिस को लेकर कांग्रेस का बचाव
कांग्रेस का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन को केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 223 के तहत एक नोटिस प्राप्त हुआ था। पार्टी नेताओं के अनुसार एक आवेदक ने 10 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए आवेदन दिया था, जिसके संबंध में यह नोटिस जारी किया गया था।
विवेक तन्खा ने बताया कि नटराजन ने इस नोटिस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि उनका उस मामले से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब न कोई अपराध दर्ज था, न कोई प्राथमिकी और न ही कोई लंबित आपराधिक मुकदमा, तो फिर यह कैसे माना गया कि उम्मीदवार ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई है।
अदालत की शरण में जाएगी कांग्रेस
राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले उत्पन्न हुए इस विवाद ने प्रदेश की राजनीति को गर्मा दिया है। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि वह निर्वाचन अधिकारी के फैसले को न्यायालय में चुनौती देगी। वहीं भाजपा का कहना है कि पूरी कार्रवाई कानून और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हुई है।
अब सबकी निगाहें अदालत और चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि इस विवाद का असर राज्यसभा चुनाव की राजनीतिक तस्वीर पर पड़ सकता है।

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