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मोदी सरकार के 11 साल: विपक्षी एकता से लेकर चुनावी संकट तक

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मोदी सरकार के 11 साल के कार्यकाल में पहली बार ऐसे नज़ारे देखने को मिले, जो पहले कभी नहीं हुए। संसद के अंदर और बाहर 300 से ज़्यादा विपक्षी सांसदों की गिरफ़्तारी, बैरिकेड तोड़ प्रदर्शन, और ज़ोरदार नारेबाज़ी—सब एक ही दिन में।

इस हलचल के बीच सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियाँ, जो पहले एक-दूसरे के साथ मंच साझा तक नहीं करती थीं, अब ‘इंडिया अलायंस’ के बैनर तले एकजुट हो गई हैं। यह विपक्षी एकता, मोदी सरकार के लिए एक ऐतिहासिक चुनौती बन चुकी है।


सरकार बहुमत पर नहीं, सहयोगियों पर निर्भर

वर्तमान में बीजेपी लोकसभा में अकेले बहुमत से दूर है। 272 का मैजिक नंबर पाने के लिए उसे चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार जैसे नेताओं का समर्थन चाहिए। लेकिन एनडीए की छोटी पार्टियों में मोदी नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।


राहुल गांधी के आरोप और चुनाव आयोग पर सवाल

राहुल गांधी ने दावा किया कि लगभग 25 सीटों पर बीजेपी की जीत का मार्जिन 35,000 वोट से भी कम था और वहाँ वोटिंग में हेराफेरी हुई। इस आरोप ने चुनाव आयोग और सरकार पर दबाव बना दिया।
धर्मेंद्र प्रधान और किरेन रिजिजू ने आयोग का बचाव किया, लेकिन इससे यह संकेत भी गया कि मामला संवेदनशील है। सोशल मीडिया पर ‘ईसी-बीजेपी नेक्सस’ की चर्चा तेज़ हो गई।


बिहार चुनाव: गेम-चेंजर

नवंबर में होने वाले बिहार चुनाव मोदी सरकार के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। अगर नीतीश कुमार की सरकार गई, तो जेडीयू टूट सकती है और एनडीए की रीढ़ कमजोर हो जाएगी।
नायडू पहले ही बिहार में वोटर लिस्ट मैनिपुलेशन को लेकर चुनाव आयोग को पत्र लिख चुके हैं, जो मोदी से उनके वैचारिक मतभेद को दर्शाता है।


चुनाव आयोग की घटती विश्वसनीयता

फ़ॉर्म 17 जैसे ज़रूरी डेटा देने से इंकार, आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल, और निष्पक्षता पर संदेह—इन सबने चुनाव आयोग की छवि पर गहरा असर डाला है। विपक्ष के साथ-साथ एनडीए सहयोगी भी अब आयोग पर सवाल उठा रहे हैं।


विपक्ष का नया आत्मविश्वास

राहुल गांधी अब एक परिपक्व और गंभीर विपक्षी नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक धड़ों को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई है। इस बार उनके आरोप महज़ भाषण नहीं, बल्कि दस्तावेज़ी सबूतों के साथ आए हैं।


2027 तक का भविष्य तय होंगे

आने वाले महीनों में बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे तय करेंगे कि 2027 तक मोदी सरकार का भविष्य कैसा होगा।
अगर बिहार और यूपी जैसे की-स्टेट्स में एनडीए कमजोर पड़ा, तो राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।


निष्कर्ष

आंतरिक असंतोष, बाहरी दबाव और विपक्षी एकता—तीनों मोर्चों पर मोदी सरकार के लिए यह सबसे कठिन दौर है। नवंबर के चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।
अब देखना यह है कि मोदी सरकार इस अभूतपूर्व दबाव को झेल पाती है या फिर भारत का राजनीतिक नक्शा बदलने वाला है।

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