बतंगड़ स्पेशल
महादेवी से वंतारा तक: सेवा या बिज़नेस
भारत में आजकल इंसानों से लेकर जानवरों तक, सबको बराबर परेशान किया जा रहा है।
कभी जनता कहती है — “वोट चोरी हो रही है!” तो सरकार का जवाब आता है — “कुत्ते पकड़ो!”
कभी जनता कहती है — “गरीबी है!” तो आदेश निकलता है — “हाथी को यहां से वहां भेज दो!”
एक हथिनी की कहानी, जो राष्ट्रीय बहस बन गई
ये कहानी है महादेवी की — कोल्हापुर की हथिनी, जिसे लोग प्यार से “माधुरी” भी कहते हैं।
1992 में कर्नाटक से लाई गई और जैन मठ में 700 साल पुरानी धार्मिक परंपरा का हिस्सा बनी।
जब गांव में महादेवी निकलती, लोग खुश होकर चिल्लाते —
“देखो… नांदनी की महादेवी आ गई!”
PETA की एंट्री और आरोप
सब कुछ ठीक था, जब तक PETA इंडिया ने आरोप नहीं लगाए —
- महादेवी को कैद में रखा जा रहा है
- लोहे के अंकुश से नियंत्रित किया जाता है
- भीख मंगवाने के लिए इस्तेमाल
- अकेलेपन और मानसिक तनाव का शिकार
PETA ने कहा कि इलाज और पुनर्वास (rehabilitation) के लिए महादेवी को गुजरात के वंतारा भेजना चाहिए।
मेडिकल रिपोर्ट और कोर्ट का फैसला
अगस्त 2023 की सरकारी मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया —
- पैरों में घाव
- चमड़ी जली हुई
- मानसिक तनाव
- महावत के पास सही देखभाल का ज्ञान नहीं
नतीजा: बॉम्बे हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि महादेवी को वंतारा भेजा जाए।
विरोध की लहर
लेकिन इसके बाद कोल्हापुर में विरोध शुरू हुआ।
लोगों ने Jio सिम फेंके, मार्च निकाले, नारे लगाए — “हथिनी हमारी, वापस लाओ!”
ये सिर्फ़ राजनीतिक मुद्दा नहीं था — साधु, संत, आम लोग सभी शामिल थे।
RTI से खुलासा हुआ —
- वंतारा चिड़ियाघर के रूप में रजिस्टर्ड ही नहीं है
- सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी में नाम तक नहीं है
आरोप लगे कि वहां जानवरों की तस्करी होती है और बिना जांच के रखा जाता है।
वंतारा और कार्बन क्रेडिट का खेल
कम लोगों को पता है कि वंतारा सिर्फ़ ‘animal care’ नहीं, बल्कि कार्बन क्रेडिट बैंक भी है।
- कंपनियां CO₂ कम करें, पेड़ लगाएं, सौर ऊर्जा अपनाएं — तो उन्हें मिलते हैं Carbon Credits
- ये क्रेडिट्स बेचे जाते हैं दूसरी कंपनियों को जो ज़्यादा प्रदूषण करती हैं
इस तरह एक कंपनी को पैसा और दूसरी को प्रदूषण की छूट मिलती है।
2026 में भारत में Carbon Credit Exchange आने से पहले ही अंबानी ये क्रेडिट्स जमा कर रहे हैं।
सवाल उठाने वाले तथ्य
जर्नलिस्ट्स ने पाया कि —
- बाघ, पैंथर के दांत ब्लंट या टूटे हुए हैं (गैरकानूनी निजी चिड़ियाघरों में आम प्रैक्टिस)
- असम के काज़ीरंगा से हाथी 3000 किमी दूर लाए गए
- स्वस्थ हाथियों को शोपीस की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है
जब जवाबदेही तय करने वाले ही इन गतिविधियों के साथ फोटो खिंचवाएं, तो सवाल कौन पूछेगा?
निष्कर्ष:
ये सिर्फ़ एक हथिनी की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की झलक है — जहां पॉलिटिक्स, कॉर्पोरेट और कानून एक साथ खड़े होते हैं।
तो आप बताइए — क्या ये सच में सेवा है, या एक नया बिज़नेस मॉडल?
💬 अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।
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