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राख का ढेर बनी उम्मीदें: आग ने छीनी झुग्गीवासियों की उम्र भर की कमाई, 2 घंटे की देरी ने मचाई तबाही

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गाजियाबाद। गुरुवार दोपहर इंदिरापुरम झुग्गीवासियों के लिए किसी काले दिन से कम नहीं रहा। एक तरफ भीषण गर्मी का प्रकोप और दूसरी तरफ आसमान छूती आग की लपटें आज झुग्गी बस्ती में आए काल ने सब कुछ स्वाहा कर दिया। किसी के घर की सिलाई मशीन राख हो गई, तो किसी के गोदाम में रखा लाखों का माल चंद मिनटों में कोयला बन गया। इस त्रासदी ने न केवल लोगों की छत छीनी, बल्कि उनके भविष्य की पूंजी और बच्चों की किताबों तक को नहीं बख्शा।

‘काश! फायर ब्रिगेड समय पर आ जाती’

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हादसे के बाद मलबे में अपना वजूद तलाश रहे लोगों के चेहरे पर व्यवस्था के खिलाफ गहरा आक्रोश दिखा। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि आग लगने के तुरंत बाद सूचित किए जाने के बावजूद, दमकल की गाड़ियाँ करीब ढाई घंटे देरी से पहुंचीं।
एक पीड़ित ने बताया, अगर सही समय पर प्रशासन जाग जाता, तो शायद हमारे बर्तन और कपड़े बच जाते। जब सब कुछ जलकर राख हो गया, तब दमकल की गाड़ियां आग बुझाने आईं ।

मलबे में भविष्य तलाशते मासूम हाथ

सबसे दर्दनाक मंजर तब दिखा जब बच्चे स्कूल से लौटे। स्कूल ड्रेस पहने और गले में आईडी कार्ड लटकाए ये बच्चे अपने घर की जगह सिर्फ धुआं और राख देख पा रहे थे। एक छोटी बच्ची ने बताया, “मैम ने स्कूल में कहा कि तुम्हारे घर में आग लग गई है, जल्दी जाओ। यहां आकर देखा तो मेरी सारी किताबें और कॉपियां जल चुकी थीं।” अब ये बच्चे जले हुए मलबे से लोहे और कबाड़ के टुकड़े चुन रहे हैं ताकि उन्हें बेचकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके।

मेहनत की पाई-पाई हुई खाक

झुग्गी में रहने वाले अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूर, घरेलू सहायक या ई-रिक्शा चालक हैं।
लाखों का नुकसान:पन्नी के गोदामों में रखा 2 से 3 लाख रुपये का माल जल गया।

रोजगार के साधन नष्ट: ई-रिक्शा, सिलाई मशीनें और साइकिलें जलकर पिघल चुकी हैं।

बचत हुई राख: कई महिलाओं ने अपनी मेहनत की कमाई 10,000 – 20,000 बेड के अंदर छिपा कर रखी थी, जो अब केवल राख के टुकड़े हैं।

सिलेंडर धमाकों ने बढ़ाई विभीषिका

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग पीछे की झुग्गियों से शुरू हुई और तेज हवाओं के कारण देखते ही देखते पूरी बस्ती को चपेट में ले लिया। आग की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बस्ती में रखे गैस सिलेंडर एक के बाद एक फटने लगे, जिससे स्थिति और भयावह हो गई। लोग केवल अपनी और अपने बच्चों की जान बचाकर भाग पाए; घर का अनाज, बिस्तर और बर्तन तक निकालने का मौका नहीं मिला।

सरकार से सांत्वना नहीं, सहायता की गुहार

हादसे के घंटों बाद भी इलाके में धुएं का गुबार छाया हुआ है और सांस लेना दूभर है। अपनों को और अपनी गृहस्थी को खो चुके इन लोगों की आंखों के आंसू अब सूख चुके हैं। अब उनकी सरकार और प्रशासन से केवल एक ही अपील है हमें सांत्वना नहीं, सिर छिपाने की छत और दोबारा शुरू करने के लिए मदद चाहिए।
सवाल अब भी वही है कि क्या प्रशासन की मुस्तैदी इन गरीबों के आशियाने बचा सकती थी? फिलहाल, ये परिवार खुले आसमान के नीचे इस उम्मीद में बैठे हैं कि कोई उनकी सुध लेगा।

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