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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बंगाल के वंचित मतदाताओं को मिला मताधिकार, ट्रिब्यूनल के आदेश पर लगी मुहर
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मियों के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जिन लोगों को अपील ट्रिब्यूनल से राहत मिली है, उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के इस आदेश ने हजारों मतदाताओं के लिए लोकतंत्र के महापर्व में शामिल होने का रास्ता साफ कर दिया है, क्या है पूरा मामला?
पश्चिम बंगाल में नागरिकता और मतदाता सूची में नाम को लेकर लंबे समय से कानूनी पेच फंसा हुआ था। कई ऐसे नागरिक थे जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे या जिन्हें ‘संदिग्ध’ श्रेणी में डाल दिया गया था। इन लोगों ने कानूनी प्रक्रिया के तहत अपील ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था।
ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें वैध नागरिक माना था, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर उन्हें मतदान करने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था।
कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें
न्यायालय ने अपने फैसले में नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा है:
ट्रिब्यूनल का सम्मान: कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सक्षम ट्रिब्यूनल ने किसी व्यक्ति को राहत दी है, तो चुनाव आयोग या स्थानीय प्रशासन उसे वोट डालने से नहीं रोक सकता।
वोटिंग का अधिकार: सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह यह सुनिश्चित करे कि इन लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल हों और वे बिना किसी भय या बाधा के अपना वोट डाल सकें।
प्रशासन को फटकार: कोर्ट ने प्रशासन को सख्त हिदायत दी है कि न्यायिक आदेशों का पालन तत्परता से किया जाए ताकि किसी भी वैध नागरिक का संवैधानिक अधिकार न छीने।
“मतदान का अधिकार लोकतंत्र की नींव है। यदि एक न्यायिक संस्था (ट्रिब्यूनल) ने किसी की नागरिकता या पात्रता की पुष्टि कर दी है, तो उसे वोट देने से रोकना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।”
— सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने न केवल हजारों लोगों को उनकी पहचान वापस दिलाई है, बल्कि भारतीय चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जनता के भरोसे को भी मजबूत किया है। अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है कि वह कितनी जल्दी इन मतदाताओं को बूथ तक पहुँचाने की व्यवस्था करता है।

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