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19 की उम्र में मौत को मात, टाइगर हिल पर लहराया तिरंगा

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Yogendra Singh Yadav being greeted by the Army Chief V.P. Malik upon receiving the Param Vir Chakra

जानिए परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र यादव की कहानी

उम्र सिर्फ एक संख्या है, यह बात कहना आसान है, लेकिन इसे अपने जीवन से साबित करना बेहद कठिन। कर्नल योगेंद्र सिंह यादव ने 19 साल की उम्र में ऐसा ही कर दिखाया। 1999 के कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर असाधारण साहस के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे इस सम्मान को पाने वाले सबसे कम उम्र के सैनिक हैं।

सेना का सपना बचपन से

योगेंद्र सिंह यादव का जन्म 10 मई 1980 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गांव में हुआ। उनके पिता रामकरण सिंह सेना में रहे थे और 1965 तथा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में हिस्सा लिया था। पिता और बड़े भाई को देखकर योगेंद्र के मन में भी सेना में जाने की इच्छा पैदा हुई। महज 16 वर्ष की उम्र में वे ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हो गए।

उनका बचपन किसी बड़े शहर की सुविधाओं में नहीं, बल्कि एक सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता। यही वजह है कि उनकी कहानी केवल युद्ध में दिखाई गई बहादुरी की नहीं, बल्कि छोटे से गांव से बड़े लक्ष्य तक पहुंचने की भी कहानी है।

टाइगर हिल की वह रात

जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान 18 ग्रेनेडियर्स की घातक पलटन को टाइगर हिल पर कब्जा करने का जिम्मा मिला। दुर्गम और बर्फीले पहाड़ पर चढ़ना बेहद कठिन था। योगेंद्र सिंह यादव आगे बढ़ने वाली टीम में शामिल थे और उन्होंने चढ़ाई के लिए रस्सी लगाने की जिम्मेदारी संभाली।

दुश्मन की भारी गोलीबारी के बावजूद उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। आधिकारिक विवरण के अनुसार, वे गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन पीछे हटने के बजाय दुश्मन की चौकियों को निष्क्रिय करने की कार्रवाई जारी रखी। उनके साहस से पूरी पलटन को आगे बढ़ने का हौसला मिला और टाइगर हिल पर कब्जा करने में सफलता मिली।

सिर्फ 19 साल की उम्र में परमवीर चक्र

उनकी वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 2000 को उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 वर्ष थी।

लेकिन योगेंद्र सिंह यादव की कहानी केवल एक वीरता पदक पर खत्म नहीं हुई। वे सेना में अपनी सेवा जारी रखते रहे और बाद में जूनियर लीडर्स अकादमी, बरेली में भावी सैनिकों और नेताओं को प्रशिक्षण देने से भी जुड़े। दिसंबर 2021 में उन्होंने सैन्य सेवा से सेवानिवृत्ति ली।

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आज भी जारी है प्रेरणा का सफर

सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी योगेंद्र सिंह यादव युवाओं के बीच सक्रिय रहे हैं। वह शिक्षण संस्थानों में जाकर अपने अनुभव साझा करते हैं और युवाओं को कठिन परिस्थितियों में धैर्य, अनुशासन और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। 2026 में भी उनके बारे में प्रकाशित रिपोर्टों में उन्हें नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले व्यक्तित्व के रूप में सामने रखा गया है।

उन्होंने अपने अनुभवों पर ‘द हीरो ऑफ टाइगर हिल’ नाम से आत्मकथा भी लिखी है, जिसमें उनके जीवन, सेना में प्रवेश और कारगिल युद्ध के अनुभवों को सामने रखा गया है।

वीरता का मतलब सिर्फ डर न होना नहीं

योगेंद्र सिंह यादव की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि वीरता का अर्थ डर का पूरी तरह खत्म हो जाना नहीं है। कठिन परिस्थिति में अपने कर्तव्य और साथियों के प्रति जिम्मेदारी को प्राथमिकता देना भी वीरता है।
उनकी यात्रा यह भी सिखाती है कि प्रेरणा केवल बड़े शहरों, महंगे संस्थानों या सुविधाओं से नहीं आती। एक छोटे गांव का युवा भी अनुशासन, मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर देश के सर्वोच्च सम्मान तक पहुंच सकता है।
19 साल की उम्र में परमवीर चक्र हासिल करने वाला यह सैनिक आज भी अपनी पहचान सिर्फ एक पदक से नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी से जोड़ता है जो नई पीढ़ी को अपने देश, अपने लक्ष्य और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहने की प्रेरणा देती है।

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