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पीएमसीएच का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, 7 साल बाद भी मरीजों से दूर, करोड़ों की मशीनें खा रहीं धूल
पटना। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को आधुनिक बनाने के दावों के बीच राजधानी स्थित पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर रहा है। वर्ष 2019 में शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के सात साल बाद भी अस्पताल पूरी तरह संचालित नहीं हो पाया है। स्थिति यह है कि करोड़ों रुपये की अत्याधुनिक मशीनें कमरों में पैक पड़ी धूल फांक रही हैं, जबकि मरीजों को जांच और इलाज के लिए अब भी एक भवन से दूसरे भवन के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल में न्यूरो, कार्डियोलॉजी और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए 6.5 करोड़ रुपये से अधिक की मशीनरी खरीदी गई थी। लेकिन इनमें से अधिकांश उपकरण अब तक चालू नहीं किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बिना उपयोग के रखी गई मशीनों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और करोड़ों रुपये का निवेश व्यर्थ हो सकता है।
डॉक्टर हैं, लेकिन मरीज नहीं
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के लिए सात वर्ष पहले 40 से अधिक विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की गई थी। इन डॉक्टरों के वेतन पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन अस्पताल में नियमित रूप से मरीजों का उपचार शुरू नहीं हो पाया है। स्थानीय लोगों और कई मरीजों को तो यह तक जानकारी नहीं है कि पीएमसीएच परिसर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल कहां स्थित है।
जांच के लिए अब भी भटकते हैं मरीज
अस्पताल की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे और कई पैथोलॉजी जांचों के लिए दूसरे भवनों में भेजा जाता है। भीषण गर्मी और आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों और उनके परिजनों को एक इमारत से दूसरी इमारत तक दौड़ना पड़ता है।
एक मरीज के परिजन ने बताया कि ब्लड टेस्ट एक भवन में होता है, जबकि अन्य जांचों के लिए दूसरे भवन में जाना पड़ता है। इससे गंभीर मरीजों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
अधूरी व्यवस्थाओं में अटका अस्पताल
रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल में ऑक्सीजन पाइपलाइन, भारी क्षमता वाले एयर कंडीशनिंग सिस्टम, आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर में लगाए गए कई उपकरणों की अंतिम तकनीकी जांच अब तक पूरी नहीं हुई है। वहीं ऑपरेशन थिएटर और मेडिकल उपकरणों को संक्रमणमुक्त करने वाली स्टेरिलाइजेशन यूनिट भी अभी तक पूरी तरह चालू नहीं हो सकी है।
भवन तैयार, व्यवस्था अधूरी
ग्राउंड प्लस सात मंजिला इस अस्पताल को प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं का नया केंद्र बनाने का दावा किया गया था। लेकिन वर्तमान स्थिति में भवन तो खड़ा है, परंतु अधिकांश सुविधाएं अब भी पुराने अस्पताल परिसर पर निर्भर हैं। इससे सवाल उठ रहे हैं कि केवल भवन निर्माण और उद्घाटन से क्या स्वास्थ्य सेवाओं में वास्तविक सुधार संभव है?
जवाबदेही तय करने की जरूरत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि करोड़ों रुपये की मशीनरी और मानव संसाधन उपलब्ध हैं, तो उन्हें तत्काल उपयोग में लाने की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। अन्यथा सार्वजनिक धन की बर्बादी के साथ-साथ मरीजों को भी बेहतर इलाज से वंचित रहना पड़ेगा।
मरीजों को इंतजार कब तक?
पीएमसीएच का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरा था। लेकिन सात वर्षों बाद भी अधूरी तैयारियां, बंद पड़ी मशीनें और भटकते मरीज यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर यह अस्पताल अपनी पूरी क्षमता के साथ कब शुरू होगा। स्वास्थ्य सुविधाओं का वास्तविक मूल्य भवनों और उद्घाटनों से नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाली सेवाओं से तय होता है।

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