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12 करोड़ की लागत से बना पुल तीन साल में हुआ जर्जर, 16 में से 6 पिलरों ने छोड़ी जमीन

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गया। बतसपुर और सिलौन को जोड़ने वाले करोड़ों रुपये की लागत से बने पुल की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। लगभग 12 करोड़ 2 लाख 76 हजार रुपये की लागत से निर्मित इस पुल के 16 में से 6 पिलर जमीन से अलग हो चुके हैं। पुल की यह स्थिति सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद प्रशासन और संबंधित विभाग ने मरम्मत कार्य शुरू कर दिया।

जानकारी के अनुसार पुल का उद्घाटन 28 जनवरी 2023 को तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव द्वारा किया गया था। उद्घाटन के महज तीन वर्ष बाद ही पुल के कई पिलरों में गंभीर क्षति दिखाई देने लगी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल के पिलर जमीन से संपर्क खो चुके थे, जिससे भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका बढ़ गई थी।

पिलरों में दिखाई दिए सरिए, जंग लगने के भी आरोप

स्थल पर निरीक्षण के दौरान पिलरों के भीतर लगे सरिए कई स्थानों पर खुले दिखाई दिए। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता किया गया, जिसके कारण पुल की आयु अपेक्षित समय से पहले ही प्रभावित हो गई।
वायरल वीडियो में यह भी दावा किया गया कि पिलरों के अंदर सरियों पर जंग के निशान दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इसकी तकनीकी पुष्टि संबंधित विभाग द्वारा अभी नहीं की गई है।

भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक

पुल की स्थिति सामने आने के बाद प्रशासन ने एहतियातन पुल के दोनों ओर बैरिकेडिंग कर भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। वर्तमान में क्षतिग्रस्त पिलरों की मरम्मत का कार्य जारी है। मजदूरों द्वारा पिलरों के नीचे भराई और मजबूतीकरण का कार्य किया जा रहा है।

निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर भी उठे प्रश्न

मरम्मत कार्य के दौरान उपयोग की जा रही ईंटों और अन्य निर्माण सामग्री को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि निर्माण और मरम्मत दोनों में उच्च गुणवत्ता के मानकों का पालन नहीं किया गया तो भविष्य में समस्या दोबारा उत्पन्न हो सकती है।

100 से अधिक गांवों की जीवनरेखा है यह पुल

बतसपुर और सिलौन को जोड़ने वाला यह पुल क्षेत्र के 100 से अधिक गांवों के लिए महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग माना जाता है। पुल की खराब स्थिति से ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत नहीं होती तो आगामी मानसून में स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

सोशल मीडिया पर उठे सवाल

पुल की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। लोगों का सवाल है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पुल इतनी जल्दी क्षतिग्रस्त कैसे हो गया। साथ ही निर्माण कार्य की निगरानी, तकनीकी परीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं।

जवाबदेही तय करने की मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पुल निर्माण में हुई संभावित अनियमितताओं की जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से बनने वाली परियोजनाओं में गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है।

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