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नौतपा की तपिश में जलते सपने: 45 डिग्री गर्मी में मजदूरी कर पेट पालने को मजबूर श्रमिक

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इंदौर। नौतपा की भीषण गर्मी में जहां लोग दोपहर के समय घरों से बाहर निकलने से बच रहे हैं, वहीं शहर की लोहा मंडी में सैकड़ों मजदूर 45 डिग्री तापमान में अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिनभर मेहनत कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से दोपहर 12 से 3 बजे तक बाहर न निकलने की एडवाइजरी जारी की गई है, लेकिन रोज कमाने और रोज खाने वाले इन मजदूरों के पास काम करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

दोपहर करीब डेढ़ बजे लोहा मंडी इलाके में मजदूर सिर पर बोरी, सरिया और भारी सामान ढोते नजर आए। किसी के हाथों में छाले हैं, किसी के शरीर पर चोटों के निशान, तो कोई टूटी चप्पलों में तपती जमीन पर चलने को मजबूर है।

“हाथ-पैर टूट गए, फिर भी मजदूरी करनी पड़ती है”

एक मजदूर ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा, ठेला पलट गया था, मेरे हाथ-पैर टूट गए थे। अब भारी काम नहीं कर पाता, हल्का-फुल्का काम करता हूं। जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन मांगकर खाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि कभी 250 रुपये मिल जाते हैं तो कभी पूरा दिन बिना काम के गुजर जाता है। ऐसे में परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

सुबह से रात तक मेहनत, फिर भी अधूरी जरूरतें

मजदूरों का कहना है कि वे सुबह 11 बजे से लेकर रात 9-10 बजे तक काम की तलाश में मंडी में बैठे रहते हैं। कोई गाड़ी खाली करवाने बुला ले तो काम मिल जाता है, नहीं तो पूरा दिन इंतजार में गुजरता है।

एक हम्माल ने कहा, कभी 500-600 रुपये मिल जाते हैं, कभी 100-200 में ही दिन निकालना पड़ता है। गर्मी हो, बारिश हो या ठंड, काम तो करना ही पड़ता है।

बच्चों की पढ़ाई भी गरीबी की भेंट

कई मजदूर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी उनकी सबसे बड़ी बाधा है। एक मजदूर ने बताया कि उसका बड़ा बेटा पढ़ाई छोड़कर नौकरी करने लगा, जबकि छोटे बच्चों की पढ़ाई भी मुश्किल से चल रही है। एक अन्य मजदूर ने कहा, बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिल पा रहा क्योंकि उनके जन्म प्रमाण पत्र नहीं बने हैं। कई बार कलेक्टर ऑफिस के चक्कर लगाए, लेकिन काम नहीं हुआ।

सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच रहा

मजदूरों का आरोप है कि सरकार की कई योजनाएं कागजों तक सीमित हैं। कुछ लोगों ने बताया कि दो साल पहले अधिकारियों ने आधार और पैन कार्ड बनवाए थे और रोजगार दिलाने का भरोसा दिया था, लेकिन उसके बाद कोई मदद नहीं मिली।
एक मजदूर ने कहा, लाड़ली बहना योजना के लिए भी कई महीनों से चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।

किराए का कमरा और कर्ज का बोझ

अधिकांश मजदूर किराए के छोटे कमरों में रहते हैं। किसी का किराया 500 रुपये है तो कोई कच्चे मकान में परिवार के साथ गुजर-बसर कर रहा है। मजदूरों का कहना है कि अगर एक दिन काम न मिले तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। एक मजदूर ने कहा, हमारे लिए हर दिन कमाना जरूरी है। अगर एक दिन काम नहीं मिला तो घर की हालत खराब हो जाती है।

जिसके पास पैसा है वही सुरक्षित है

लोहा मंडी में काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि समाज में आर्थिक असमानता साफ दिखाई देती है। जहां संपन्न लोग एयर कंडीशनर वाले कमरों में रहते हैं, वहीं गरीब मजदूर धूल, धूप और गर्मी में काम करने को मजबूर हैं। एक मजदूर ने भावुक होकर कहा, जिसके पास पैसा है वही सुरक्षित है। गरीब आदमी 200-250 रुपये कमाए तो पहले आटा खरीदे, किराया दे या बच्चों का खर्च चलाए? भी

महंगी कोचिंग की टी-शर्ट में मजदूरी

रिपोर्टिंग के दौरान एक मजदूर की टी-शर्ट पर मशहूर कोचिंग संस्थान का नाम लिखा दिखाई दिया। पूछने पर पता चला कि यह टी-शर्ट उसके बेटे ने दी थी, जो वहां काम करता है। यह दृश्य समाज की गहरी आर्थिक खाई को बयां करता है। एक तरफ जहां लाखों रुपये खर्च कर बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी संस्थान की टी-शर्ट पहनकर एक मजदूर 200 रुपये की दिहाड़ी के लिए संघर्ष कर रहा है।

लोहा मंडी के मजदूरों की जिंदगी सिर्फ मेहनत और संघर्ष तक सीमित होकर रह गई है। न स्थायी रोजगार, न सामाजिक सुरक्षा और न ही सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ। इन मजदूरों का कहना है कि वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुरक्षित भविष्य मिल सके। भीषण गर्मी में तपते हुए ये मजदूर हर दिन अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं, लेकिन सवाल आज भी वही है क्या विकास का लाभ वास्तव में समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पा रहा है?

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