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देश के 10 बड़े नेता जिनके ऊपर आपराधिक मामले

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भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत अब पूरी तरह चरितार्थ होती दिख रही है, सांसदों और विधायकों की योग्यता का पैमाना अब जनसेवा नहीं, बल्कि उनके हलफनामे में दर्ज मुकदमों की संख्या तय करने लगी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेताओं द्वारा खुद चुनाव आयोग को सौंपे गए हलफनामों के ताज़ा आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश को चलाने वाले माननीय कानून बनाने से ज्यादा, कानून की धाराओं को अपने नाम के आगे जोड़ने में व्यस्त हैं।
कटाक्ष की बात तो यह है कि आम नागरिक अगर एक छोटी सी धारा में भी फंस जाए, तो उसे सरकारी चपरासी की नौकरी नहीं मिलती, लेकिन हमारे माननीय ‘सैकड़ों’ मुकदमों का तमगा सीने पर टांगकर पूरे सूबे की कमान संभाल लेते हैं। आइए देखते हैं कि कैसे देश के शीर्ष नेताओं ने ‘दागों को ही अपना सबसे बड़ा गहना’ बना लिया है।

माननीय मुख्यमंत्रियों का ‘क्राइम ग्राफ़’

जब सूबे का मुखिया ही मुकदमों के शतक के करीब हो, तो कानून व्यवस्था की दुहाई देना भी एक बेहतरीन चुटकुला बन जाता है।

ए. रेवंत रेड्डी : इस रेस में तेलंगाना के मुख्यमंत्री सबसे आगे दौड़ रहे हैं। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, इनके ऊपर 89 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें आपराधिक साजिश से लेकर लोक सेवक को ऑन-ड्यूटी चोट पहुँचाने तक के मामले शामिल हैं। जनता सोचती थी कि मुख्यमंत्री सचिवालय से सरकार चलाएंगे, यहाँ तो फाइलों से ज्यादा मुकदमों की फेहरिस्त लंबी है।

एम. के. स्टालिन : दक्षिण भारत के इस रसूखदार नेता पर 47 मामले दर्ज हैं। भले ही इनमें से अधिकांश राजनीतिक आंदोलनों और मानहानि के हों, लेकिन कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने के मामले में इनका रिकॉर्ड भी शानदार है।

एन. चंद्रबाबू नायडू : ‘हाई-टेक’ विजन की बात करने वाले नायडू साहब के खाते में 19 आपराधिक मामले हैं। हाल ही में ‘स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन घोटाला’ इनके राजनीतिक करियर का सबसे चर्चित मोड़ रहा, जिसने इन्हें सीधे जेल की हवा खिला दी। राजनीति में इसे ‘अनुभव’ कहा जाता है।

हेमंत सोरेन : झारखंड की कमान संभालने वाले सोरेन जी पर 5 मामले दर्ज हैं, लेकिन वजन के मामले में ये किसी से कम नहीं हैं। भूमि घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने इन्हें गिरफ्तार किया, जेल भेजा, पर राजनीति का जादू देखिए जमानत मिलते ही साहब फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं।

सिद्धारमैया: 13 आपराधिक मामलों के साथ कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी इस सूची में अपनी जगह बनाए हुए हैं। इन दिनों मैसूरु शहरी विकास प्राधिकरण भूमि आवंटन घोटाले की जांच की आंच इन तक पहुंच रही है, लेकिन कुर्सी पर आंच नहीं आने दी जा रही।

‘घोटालों के उस्ताद’ और रिकॉर्डधारी क्षत्रप

कुछ नेताओं ने राजनीति में वो मुकाम हासिल कर लिया है जहाँ
घोटाले और मुकदमे उनके नाम के पर्यायवाची बन चुके हैं।

लालू प्रसाद यादव : भारतीय राजनीति के ‘फॉरएवर ग्रीन’ आरोपी। करोड़ों रुपये का चारा घोटाला इनके नाम ऐसे दर्ज हुआ कि कई मामलों में कोर्ट ने इन्हें बाकायदा दोषी ठहराकर सजा सुना दी। फिलहाल मेडिकल ग्राउंड और जमानत पर बाहर हैं, और अब ‘लैंड फॉर जॉब’ के नए मुकदमों का स्वाद चख रहे हैं।

के. सुरेंद्रन : अगर मुकदमों की संख्या को ही चुनावी जीत का पैमाना मान लिया जाए, तो सुरेंद्रन साहब को देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए था। इनके ऊपर 240 से अधिक मामले दर्ज हैं। गनीमत है कि इनमें से ज्यादातर सबरीमाला विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हैं, वरना इतने मामलों की फाइलें रखने के लिए अलग से एक गोदाम किराए पर लेना पड़ता।

अरविंद केजरीवाल : ‘कट्टर ईमानदारी’ का बोर्ड लगाकर राजनीति में आए केजरीवाल जी का बोर्ड अब ‘दिल्ली आबकारी नीति’ के कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस से ढक गया है। ED और CBI की धाराओं के साथ तिहाड़ जेल का लंबा सफर काटकर आए हैं, पर राजनीति की ढीटता देखिए, इस्तीफा देने के बाद भी रसूख वही है।

आजम खान: 90 से अधिक आपराधिक मामले। किताब चोरी, भैंस चोरी, जमीन हड़पने से लेकर भड़काऊ भाषण तक ऐसा कोई कोना नहीं बचा जो इन पर न आजमाया गया हो। नतीजा? विधायकी भी गई और फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे से लोकतंत्र को निहार रहे हैं।

सुवेन्दु अधिकारी : दल बदलने से अगर पाप धुलते, तो सुवेन्दु जी अब तक गंगा नहा चुके होते। तृणमूल से भाजपा में आए अधिकारी जी पर चर्चित नारदा स्टिंग ऑपरेशन समेत राज्य में राजनीतिक हिंसा के कई गंभीर मामले दर्ज हैं।

हमारे लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत विडंबना यही है कि जब तक अदालत आखिरी मुहर न लगा दे, तब तक हर आरोपी पाक-साफ है। राजनीतिक दल इसे बदले की कार्रवाई कहते हैं और जनता इसे नेताओं का भौकाल। देखना यह है कि यह दागदार लोकतंत्र कब तक इन माननीयों के बोझ को ढोता रहेगा, या फिर आने वाले समय में मुकदमों की संख्या ही टिकट पाने की अनिवार्य योग्यता बन जाएगी।

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