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गाजियाबाद कलेक्ट्रेट पर गरजे किसान: ‘अधिग्रहण और महंगाई’ के खिलाफ आमरण अनशन का ऐलान
गाजियाबाद। दिल्ली-एनसीआर समेत आसपास के जिलों से आए हजारों किसानों ने मंगलवार को गाजियाबाद कलेक्ट्रेट पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले आयोजित इस ‘किसान-मजदूर हुंकार महापंचायत’ में पुलिस प्रशासन द्वारा कलेक्ट्रेट से हटाए जाने के बाद किसान वहां से करीब 500 मीटर की दूरी पर डट गए। किसानों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे और बुधवार (कल) से यह आंदोलन आमरण अनशन में तब्दील हो जाएगा।
ज़मीन अधिग्रहण और सर्किल रेट 10 गुना करने की मांग
महापंचायत में पहुंचे किसानों का मुख्य गुस्सा भूमि अधिग्रहण की नीतियों और कम मुआवजे को लेकर था। किसानों ने आरोप लगाया कि वेब सिटी और लोनी की तरफ किसानों की जमीनों का गलत तरीके से अधिग्रहण किया जा रहा है।
एक प्रदर्शनकारी किसान ने कहा, सरकार बिना हमारी मर्जी के जबरदस्ती जमीनें छीन रही है। जहां रेट एक करोड़ या दो करोड़ रुपये बीघा होना चाहिए, वहां बेहद कम मुआवजा दिया जा रहा है। हमारी मांग है कि सर्किल रेट को कम से कम 10 गुना बढ़ाया जाए। किसानों ने तंज कसते हुए कहा कि कॉरपोरेट घरानों को तो सरकार आसानी से जमीनें दे देती है, लेकिन देश का अन्नदाता अपने हक के लिए सड़कों पर धूल फांक रहा है।

‘कल से भूख हड़ताल, मरना मंजूर पर पीछे नहीं हटेंगे’
दोपहर की कड़कती धूप में बिना एसी और पंखे के जमीन पर बैठे किसानों का हौसला डिगा नहीं है। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कोई कुछ घंटों का सांकेतिक धरना नहीं है। एक बुजुर्ग किसान ने भावुक और कड़े शब्दों में कहा, आज का धरना भोजन के साथ चल रहा है, लेकिन कल से यह आमरण अनशन में बदल जाएगा। मैं यहीं बैठा रहूंगा, चाहे मरना मंजूर हो। सरकार को लगता है कि हम आतंकवादी या बाहरी हैं, तो सरकार हमें सीधे गोली मार दे, लेकिन हम हटेंगे नहीं।
जब किसानों से पूछा गया कि सरकार उनकी बातें क्यों नहीं सुन रही, तो उन्होंने आरोप लगाया कि जनता पर ‘हिंदुत्व का चश्मा’ चढ़ाकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है ताकि सत्ता में बने रहा जा सके।
डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और एनजीटी कानून पर घेरा
किसानों ने केवल खेती ही नहीं, बल्कि आम जनता से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि महज 10 दिनों के भीतर एलपीजी, डीजल और पेट्रोल के दाम कई बार बढ़ाए जा चुके हैं, लेकिन फसलों और गन्ने के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ रहे।
इसके साथ ही, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 10 साल पुराने ट्रैक्टरों पर प्रतिबंध के कानून को कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला बताया गया। किसानों के मुताबिक, यह नीतियां केवल ऑटोमोबाइल कंपनियों की जेब भरने के लिए बनाई गई हैं।
‘युवाओं को नौकरी नहीं, मजदूर बनाना चाहती है सरकार’
महापंचायत में पेपर लीक और बेरोजगारी का मुद्दा भी गूंजा। सोशल मीडिया पर चर्चा बटोर रही नई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का जिक्र करते हुए युवाओं ने कहा कि वे भी इसके साथ जुड़ रहे हैं। पेपर लीक पर बात करते हुए एक किसान नेता ने कहा, सारे पेपर इसलिए लीक हो रहे हैं क्योंकि सरकार नौकरी देना ही नहीं चाहती। युवाओं को पढ़ा-लिखाकर मजदूर बनाना चाहती है, ताकि वे कॉरपोरेट की फैक्ट्रियों में 10-15 हजार की नौकरी करने पर मजबूर हो जाएं।
वार्ता या बड़ा आंदोलन
जब किसान नेताओं से पूछा गया कि अगर प्रशासन उनकी मांगें नहीं मानता तो आगे क्या होगा? इस पर उन्होंने कहा कि फिलहाल अधिकारियों से बातचीत का रास्ता खुला है। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा। किसानों ने याद दिलाया कि पहले भी 13 महीने के आंदोलन के आगे प्रधानमंत्री को झुकना पड़ा था, अगर दोबारा जरूरत पड़ी तो किसान पीछे नहीं हटेगा।

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