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रतनगढ़ के किसान बदहाल, 50 किमी दूर जाने की मजबूरी; कागजों में ‘सिंचित क्षेत्र’ पर धरातल पर मंडी को लगा ताला
रतनगढ़। राजस्थान का वह क्षेत्र जो अपनी रबी और खरीफ की फसलों के लिए जाना जाता है, जहाँ 75 प्रतिशत भूमि सिंचित है, वहां के किसानों की नियति आज ‘दर-दर की ठोकरें’ खाना बन गई है। चूरू जिले के रतनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में कृषि विपणन व्यवस्था दम तोड़ रही है। हालात यह हैं कि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए 50 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर जिसे ‘मंडी’ कहा जाता है, वह महज एक संकरी गली में स्थित किराए का एक छोटा सा कमरा है, जिस पर अक्सर ताला लटका रहता है।
14 फीट की गली में ‘कृषि उपज मंडी’ न रास्ता, न बोर्ड

रतनगढ़ विधानसभा में राजेश्वर और रतनगढ़ दो तहसीलें आती हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि 90 हजार से एक लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में मंडी के नाम पर कोई बुनियादी ढांचा नहीं है। मुख्य सड़क से दूर, 14 फीट की संकरी गली में एक निजी मकान को मंडी कार्यालय बनाया गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यहाँ कोई साइन बोर्ड या पोस्टर तक नहीं है। लोग चाय की दुकानों पर पूछते फिरते हैं कि मंडी कहाँ है, और अक्सर उन्हें खाली हाथ या गलत पते पर भटकना पड़ता है।
‘विधानसभा में उठाई आवाज, पर बजट मिला शून्य’

स्थानीय विधायक ने इस अव्यवस्था पर गहरा रोष व्यक्त किया है। उन्होंने बताया, मैंने लगातार मुख्यमंत्री से निवेदन किया और विधानसभा में प्रश्न खड़े किए, लेकिन हर बार बजट में हमें ‘जीरो’ मिलता है। हमारी विधानसभा का 75% हिस्सा सिंचित है, हमारे पास नंदीशाला के पास सैकड़ों बीघा सरकारी जमीन उपलब्ध है, लेकिन सरकार की इच्छाशक्ति मरी हुई है।
विधायक ने आरोप लगाया कि विपक्ष का होने के कारण सरकार उनके क्षेत्र के साथ पक्षपात कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का यह बयान कि ‘किसान केवल 30 दिन काम करता है, किसानों के प्रति उनकी संवेदनहीनता को दर्शाता है, जबकि हकीकत में किसान छह-छह महीने खून-पसीना एक करता है।
न बैठने की जगह, न ट्रैक्टर का रास्ता
मंडी के नाम पर संचालित किराए के भवन की स्थिति इतनी दयनीय है कि यदि 10 किसान भी एक साथ आ जाएं, तो उनके बैठने की व्यवस्था नहीं है।
यातायात की बाधा: जिस गली में कार्यालय है, वहां एक फोर-व्हीलर आ जाए तो पूरा रास्ता जाम हो जाता है। ऐसे में फसल से लदे बड़े ट्रैक्टरों का वहां पहुंचना नामुमकिन है।
50 किमी की दूरी: मंडी यार्ड न होने के कारण किसानों को मजबूरी में अपनी फसलें औने-पौने दाम पर सड़क किनारे बेचनी पड़ती हैं या भारी परिवहन लागत लगाकर 50 किमी दूर दूसरी मंडियों में जाना पड़ता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर सिर्फ ‘बड़ा ताला’
राजस्थान सरकार करोड़ों रुपये के कृषि बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर के दावे करती है, लेकिन रतनगढ़ के धरातल पर इन दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। किसानों का कहना है कि वे सालों से एक व्यवस्थित ‘कृषि मंडी यार्ड’ और ‘सब्जी मंडी’ की मांग कर रहे हैं ताकि व्यापारियों और किसानों दोनों को फायदा हो और सरकार की आय भी बढ़े, लेकिन फिलहाल यहां विकास के नाम पर केवल बदहाली पसरी है।
सरकार से सवाल
मसालों और अनाज उत्पादन में उच्च स्थान रखने वाले राजस्थान में क्या एक विधायक के विपक्ष में होने की सजा किसानों को मिलनी चाहिए? क्या 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाले हजारों किसानों के लिए एक अदद मंडी यार्ड का निर्माण प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है? रतनगढ़ के किसान आज भी इन सवालों के जवाब तलाश रहे हैं।
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