देश
पेन-कॉपी की जगह नौनिहालों के हाथ में झाड़ू; नोएडा के सरकारी स्कूल में शिक्षा के भविष्य पर ‘गंदगी’ का साया
ग्रेटर नोएडा। देश के उज्ज्वल भविष्य की नींव जहाँ रखी जानी चाहिए, वहां से आई एक तस्वीर ने बेसिक शिक्षा विभाग की पोल खोल कर रख दी है। नोएडा स्थित प्राथमिक विद्यालय तुषना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें स्कूली बच्चे झाड़ू लगाते नजर आ रहे हैं। जब हमारी टीम ने इस मामले की पड़ताल की, तो स्कूल परिसर में अव्यवस्थाओं का अंबार और शिक्षकों के विरोधाभासी बयानों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
‘श्रमदान’ या बचपन से खिलवाड़?
मंडी और सफाई व्यवस्था की हकीकत जानने जब स्कूल पहुंचे, तो गेट पर ही शिक्षकों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। बच्चों से झाड़ू लगवाने के सवाल पर एक शिक्षिका ने इसे ‘श्रमदान’ का नाम देते हुए कहा, हमने बच्चों के साथ मिलकर केवल 5 मिनट का डेमो किया था। हमारी वीडियो क्यों नहीं बनाई गई, केवल बच्चों की ही क्यों ली गई?” हालांकि, स्कूल में मौजूद अन्य कर्मियों के बयानों में विरोधाभास दिखा। एक सफाई कर्मी ने कैमरे पर स्वीकार किया कि बच्चे ने थोड़ा-बहुत सफाई करने के लिए बोल दिया था, लेकिन शिक्षकों के दबाव में वह यह बताने से कतराती रहीं कि आदेश किसने दिया था।
दहशत में बच्चे, चुप्पी साधने को मजबूर

स्कूल की पांचवीं कक्षा के बच्चों से जब इस बारे में बात की गई, तो उनके चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। शिक्षकों की मौजूदगी में बच्चों ने झाड़ू लगाने की बात से इनकार किया, लेकिन उनकी डरी हुई नजरें और शिक्षकों का हस्तक्षेप यह बताने के लिए काफी था कि उन्हें चुप रहने की हिदायत दी गई है। एक ओर सरकार ‘विकसित भारत’ और ‘डिजिटल शिक्षा’ का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चे सफाई कर्मी बनने को मजबूर हैं।
प्रिंसिपल नदारद, शौचालय बदहाल
हैरानी की बात यह है कि वायरल वीडियो और विवाद के बीच स्कूल की प्रिंसिपल सुनीता रानी पिछले शनिवार से ही आकस्मिक अवकाश पर हैं। स्कूल में सात शिक्षकों में से दो अक्सर अनुपस्थित रहते हैं। स्कूल की भौतिक स्थिति भी चिंताजनक है।
शौचालय की स्थिति: शौचालयों में गंदगी का अंबार है और मच्छरों का प्रकोप है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
सफाई कर्मचारी का अभाव: शिक्षकों ने खुद स्वीकार किया कि विभाग की ओर से कोई स्थाई सफाई कर्मचारी नियुक्त नहीं है, जिसके कारण कभी शिक्षक तो कभी बच्चे सफाई करने को मजबूर होते हैं।
सुरक्षा में चूक: स्कूल के गेट खुले रहते हैं, जिससे आवारा पशुओं के अंदर आने का खतरा बना रहता है।
अधिकारियों की चुप्पी पर उठते सवाल
बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और स्थानीय शिक्षा अधिकारियों की सक्रियता पर अब सवाल उठ रहे हैं। क्या नोएडा जैसे हाई-टेक शहर के स्कूलों में बच्चों से झाड़ू लगवाना ही ‘नया भारत’ है? ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायत करने पर अधिकारी केवल फोटो खींचकर खानापूर्ति करते हैं, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सरकारी स्कूलों में जवाबदेही तय नहीं होगी और सफाई जैसे बुनियादी कार्यों के लिए संसाधन नहीं जुटाए जाएंगे, तब तक गरीब बच्चों का भविष्य कागजों और संकरी गलियों में झाड़ू लगाते हुए ही दम तोड़ता रहेगा।
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