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पटरी किनारे ‘किराए’ की सांसें: राजधानी में विकास के होर्डिंग्स के पीछे छिपी बदरंग हकीकत

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नई दिल्ली। राजधानी की चमक-धमक और लुटियंस दिल्ली की वीआईपी सड़कों से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी दुनिया बसती है, जहाँ विकास के दावे लोहे के उन पहियों के नीचे दम तोड़ देते हैं जो हर 5 मिनट में एक चीख के साथ यहाँ से गुजरते हैं। यह कहानी है दिल्ली के गांधीनगर और लोहे के पुल के बीच बसे उन हजारों परिवारों की, जिनके लिए ‘सुरक्षा’ एक विलासिता है और ‘पहचान’ महज एक चुनावी पर्चा।

मौत से चंद इंच की दूरी: बाउंड्री विहीन रेलवे ट्रैक

करीब डेढ़ से दो किलोमीटर के दायरे में फैला यह झुग्गी क्षेत्र रेलवे ट्रैक के इतना करीब है कि घरों के दरवाजे और ट्रेनों के बीच फासला ना के बराबर है। हर 5 मिनट में गुजरती ट्रेनें यहाँ की जिंदगी का हिस्सा हैं, लेकिन यह हिस्सा हादसों से भरा है। यहाँ की एक स्थानीय युवती बताती है, “ट्रैक पार करना मजबूरी है। कूड़ा फेंकने जाना हो या कहीं बाहर, ट्रेन की टाइमिंग देखनी पड़ती है। कई बार हादसे होते-होते बचे हैं, और कई बार लोग जान गंवा भी चुके हैं।” हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े ट्रैक पर रेलवे की ओर से अब तक कोई बाउंड्री वॉल नहीं बनाई गई है। लोग डरे हुए हैं, लेकिन मांग करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उन्हें डर है कि अगर आवाज उठाई, तो शायद ‘अतिक्रमण’ के नाम पर सिर से यह कच्ची छत भी छीन ली जाएगी।

“सबका साथ, सबका विकास” का धरातल पर अभाव

स्थानीय निवासियों में सरकार और व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष है। एक बुजुर्ग निवासी का कहना है, “यह मोदी सरकार हो या कोई और, गरीबों के लिए कोई नहीं सोचता। स्कूल देखो तो वहां पढ़ाई की जगह चारागाह जैसा माहौल है। होर्डिंग्स और बैनर में तो बहुत विकास दिखता है, लेकिन ग्राउंड पर हम ‘जीरो’ पर खड़े हैं।” लोगों का कहना है कि जो भी बुनियादी काम हुए, वे कांग्रेस के समय में हुए थे। आज स्थिति यह है कि पीने के पानी के लिए ₹20 की बोतल खरीदनी पड़ती है। राशन कार्ड बनवाने के लिए दो-दो साल से लोग चक्कर काट रहे हैं, लेकिन बिजली बिल के नाम पर पहचान होने के बावजूद सुविधा के नाम पर राशन तक नसीब नहीं है।

आधी आबादी का पूरा डर, असुरक्षित गलियां और पत्थरबाजी

यहाँ की लड़कियों और महिलाओं के लिए समस्या सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि सुरक्षा का अभाव भी है। स्थानीय महिलाओं का दर्द है कि रात 10 बजे के बाद बाहर निकलना मुमकिन नहीं है। वह कहती हैं, “बाहर का माहौल बहुत खराब है। ट्रेनों में बैठे लोग झुग्गियों की तरफ पत्थर फेंकते हैं, गालियां देते हैं। हम उनके पीछे भाग नहीं सकते क्योंकि आगे मौत का ट्रैक है।” महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों के बीच, यहाँ की लड़कियां आज भी ‘इव-टीजिंग’ और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर हैं।

वोट बैंक की राजनीति और ‘बुलडोजर’ का खौफ

चुनाव के समय यह क्षेत्र नेताओं के लिए तीर्थ स्थल बन जाता है। “वोट के वक्त तो पैर पकड़ने को भी तैयार रहते हैं, साथ बैठकर खाना भी खाते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई शक्ल नहीं दिखाता,” एक युवक ने कड़वाहट के साथ कहा।
इन लोगों के पास अपने घर का कोई मालिकाना हक नहीं है। रेलवे की जमीन होने के कारण इन्हें हमेशा बुलडोजर का डर सताता रहता है। कई बार नोटिस लग चुके हैं, लेकिन वर्षों से यहाँ रह रहे इन लोगों के पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है।
रेलवे के अधिकारी कभी-कभी यहाँ आकर इन लोगों के साथ बैठकर चाय-पानी पी लेते हैं, लेकिन व्यवस्था का जो कड़ा पहरा यहाँ होना चाहिए था, वह नदारद है। क्या इन नागरिकों की सुरक्षा सिर्फ इसलिए सरकार की प्राथमिकता नहीं है क्योंकि ये ‘अवैध’ जमीन पर बसे हैं? या फिर इनके वोट की कीमत सिर्फ एक चुनावी मौसम तक ही सीमित है?

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