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विकसित भारत की चमक के पीछे अंधेरे में छात्र, ₹300 किलो गैस ने छीना दो वक्त का खाना
लखनऊ| जब देश 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और विश्व की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होने का जश्न मना रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीकेटी इलाके में छात्र एक अलग ही जंग लड़ रहे हैं। यहाँ का छात्र ‘विकसित भारत’ के आंकड़ों में नहीं, बल्कि ‘सर्वाइवल’ की जद्दोजहद में उलझा हुआ है। क्षेत्र में गैस की भारी किल्लत और ₹90 से सीधे ₹300 प्रति किलो तक पहुँचे गैस के दामों ने छात्रों की रसोई में आग लगा दी है।
एक वक्त का खाना, दो छात्रों का साझा निवाला

बीबीए द्वितीय वर्ष के छात्र मोहम्मद आरिफ अंसारी की आपबीती इस संकट की गहराई को बयां करती है। आरिफ बताते हैं, “हम यहाँ ख्वाहिशें पूरी करने नहीं, अपनी जरूरतें पूरी करने आए हैं। घर से पैसा उतना ही आता है, लेकिन गैस के दाम तीन गुना बढ़ गए हैं। अब हालात ये हैं कि हॉस्टल से अगर छह रोटियां आती हैं, तो दो लड़के उसमें मिल-बांटकर खाते हैं ताकि कुछ पैसे बचा सकें। हम भरपेट नहीं, सिर्फ जिंदा रहने के लिए खा रहे हैं।
₹90 का सिलेंडर अब ₹300 के पार
छात्रों का आरोप है कि जो गैस पहले ₹90 से ₹100 प्रति किलो मिलती थी, अब उसके लिए ₹300 से ₹500 तक वसूले जा रहे हैं। हॉस्टलों के बाहर खाली सिलेंडरों की कतारें इस किल्लत की गवाह हैं। छात्रों का कहना है कि गैस एजेंसियों पर जाने पर उन्हें खाली हाथ लौटा दिया जाता है या फिर मनमाने दाम मांगे जाते हैं।
पहले जो महीने का खर्च ₹2000 में चल जाता था, वह अब ₹6000-₹7000 तक पहुँच गया है। घर पर माता-पिता की आय नहीं बढ़ी है, इसलिए हम उन पर दबाव नहीं डालना चाहते और खुद भूखे रहकर मैनेज कर रहे हैं।
‘भूखा इंडिया’ कैसे बनेगा ‘पढ़ा-लिखा इंडिया’?
परीक्षाओं के समय जब छात्रों को रात भर जागकर पढ़ना होता है, तब भूख मिटाने का सबसे आसान साधन ‘मैगी’ भी अब उनके लिए सपना हो गई है। छात्रों का कहना है कि गैस जलाने से पहले उन्हें दस बार सोचना पड़ता है। मानसिक संतुलन और स्वास्थ्य पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। छात्रों का सवाल वाजिब है, अगर हम अच्छा खाएंगे ही नहीं, तो पढ़ेंगे कैसे और देश का भविष्य कैसे सुधारेंगे?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल
यह समस्या केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के कई छात्र इलाकों का यही हाल है। छात्रों ने पेट्रोलियम मंत्री और उत्तर प्रदेश सरकार से गुहार लगाई है कि इस कृत्रिम किल्लत और कालाबाजारी पर तुरंत लगाम लगाई जाए। क्षेत्रीय छात्र समुदाय का कहना है कि नेता और अधिकारी कभी खुद भी छात्र रहे होंगे, फिर वे इस पीड़ा को क्यों नहीं समझ रहे? स्ट्रगलिंग लाइफ में एक-एक रुपया बचाने वाला छात्र आज सिस्टम की अनदेखी के कारण कुपोषण और तनाव की ओर बढ़ रहा है।
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